नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): GDP: भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2025-26 में मजबूत प्रदर्शन करते हुए 7.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। हालांकि इस सकारात्मक तस्वीर के बीच कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र की धीमी पड़ती विकास दर चिंता का विषय बनकर उभरी है। देश की लगभग आधी कार्यशील आबादी को रोजगार देने वाले इस क्षेत्र की विकास दर घटकर केवल 3 प्रतिशत रह गई है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा नए आधार वर्ष 2022-23 के अनुसार जारी राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में यह जानकारी सामने आई है। आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4.2 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में घटकर 3 प्रतिशत रह गई। हालांकि यह 2023-24 की 2.6 प्रतिशत वृद्धि दर से कुछ बेहतर है।
चौथी तिमाही में भी कृषि की रफ्तार घटी
जनवरी-मार्च 2026 की चौथी तिमाही के दौरान भी कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र में सुस्ती देखने को मिली। इस अवधि में कृषि क्षेत्र की विकास दर 3.6 प्रतिशत दर्ज की गई, जो एक वर्ष पहले की समान अवधि में 3.8 प्रतिशत थी। हालांकि यह 2023-24 की चौथी तिमाही के 2.7 प्रतिशत स्तर से बेहतर रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि क्षेत्र में धीमी वृद्धि का असर ग्रामीण आय, उपभोग और कृषि निवेश पर पड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब समग्र अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ रही है।
GDP वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत पर पहुंची
नए आधार वर्ष के अनुसार स्थिर मूल्यों पर भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 2025-26 में 7.7 प्रतिशत रही। यह पिछले दो वर्षों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन है।
| वित्त वर्ष | GDP वृद्धि दर (%) |
|---|---|
| 2023-24 | 7.2 |
| 2024-25 | 7.1 |
| 2025-26 | 7.7 |
स्थिर मूल्यों पर देश की GDP का आकार 323.12 लाख करोड़ रुपये आंका गया है। वहीं मौजूदा मूल्यों पर GDP 346.36 लाख करोड़ रुपये रही, जिसमें 8.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं ने दी अर्थव्यवस्था को मजबूती
क्षेत्रवार आंकड़ों से स्पष्ट है कि कृषि की सुस्ती के बावजूद उद्योग और सेवा क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान किया।
मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर 2024-25 के 9.3 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 10.7 प्रतिशत हो गई। वहीं व्यापार, होटल, परिवहन और संचार जैसी सेवाओं में उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया गया। इस क्षेत्र की वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत पर पहुंच गई।
फाइनेंशियल सेवाएं, रियल एस्टेट और आईटी क्षेत्र भी मजबूत बने रहे। इनकी विकास दर 10 प्रतिशत से बढ़कर 10.4 प्रतिशत हो गई। जन प्रशासन एवं रक्षा क्षेत्र की वृद्धि दर 5 प्रतिशत पर स्थिर रही।

खनन और ऊर्जा क्षेत्र में आई गिरावट
कृषि के अलावा खनन क्षेत्र में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2024-25 में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करने वाला यह क्षेत्र 2025-26 में केवल 5.2 प्रतिशत की दर से बढ़ा।
इसी तरह बिजली, गैस और जलापूर्ति क्षेत्र की विकास दर 2.9 प्रतिशत से घटकर 1.7 प्रतिशत रह गई। हालांकि निर्माण (कंस्ट्रक्शन) क्षेत्र ने स्थिर प्रदर्शन करते हुए 7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो पिछले वर्ष 7.3 प्रतिशत थी।
निजी खपत और निवेश में मजबूती
भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि को घरेलू मांग और निवेश से भी समर्थन मिला। वित्त वर्ष 2025-26 में निजी अंतिम उपभोग व्यय (Private Consumption) की वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही, जबकि पिछले दो वर्षों में यह 5.8 प्रतिशत थी।
सरकारी उपभोग व्यय में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि पूंजी निवेश (Capital Formation) 8.2 प्रतिशत बढ़ा। पिछले वर्ष यह वृद्धि 6.4 प्रतिशत थी।
GDP में निजी खपत की हिस्सेदारी 55.7 प्रतिशत बनी रही। वहीं सरकारी खपत की हिस्सेदारी 10.1 प्रतिशत और पूंजी निवेश की हिस्सेदारी 32.3 प्रतिशत दर्ज की गई।
प्रति व्यक्ति आय में भी बढ़ोतरी
मौजूदा मूल्यों पर प्रति व्यक्ति GDP 2025-26 में बढ़कर 2,43,809 रुपये हो गई। यह पिछले वर्ष के 2,25,896 रुपये की तुलना में 7.9 प्रतिशत अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि का लाभ औसत आय स्तर पर भी दिखाई दे रहा है।
कृषि GVA में वृद्धि, लेकिन मौजूदा मूल्यों पर तस्वीर कमजोर
स्थिर मूल्यों पर कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन (GVA) 52.38 लाख करोड़ रुपये आंका गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3 प्रतिशत अधिक है।
हालांकि मौजूदा मूल्यों पर कृषि क्षेत्र की वृद्धि केवल 1.4 प्रतिशत रही। यह पिछले वर्ष के 9.2 प्रतिशत और 2023-24 के 7.6 प्रतिशत की तुलना में काफी कम है। इससे संकेत मिलता है कि कृषि क्षेत्र में मूल्य वृद्धि और आय विस्तार की गति कमजोर पड़ी है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर रहेगा फोकस
हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.7 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की है, लेकिन कृषि क्षेत्र की धीमी रफ्तार नीति निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। कृषि क्षेत्र की कमजोर वृद्धि न केवल ग्रामीण आय बल्कि रोजगार, खपत और समग्र आर्थिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है। आने वाले वर्षों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने, लागत कम करने और किसानों की आय में सुधार लाने के प्रयास आर्थिक विकास को अधिक समावेशी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
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