नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो)। क्रूड ऑयल कीमत: मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मंगलवार को तेज उछाल दर्ज किया गया। ब्रेंट क्रूड करीब 2.76 प्रतिशत बढ़कर 93.54 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड 2.83 प्रतिशत की तेजी के साथ 86.74 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया। कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेजी का असर भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी देखने को मिला। शेयर बाजार में बिकवाली बढ़ी, रुपया कमजोर हुआ और ऊर्जा आयात लागत बढ़ने की चिंता गहरा गई।
क्रूड ऑयल कीमत: शेयर बाजार और रुपये पर बढ़ा दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच भारतीय शेयर बाजार में कमजोरी दर्ज की गई। निफ्टी में करीब 186 अंकों (0.76 प्रतिशत) की गिरावट आई, जबकि सेंसेक्स लगभग 700 अंक लुढ़क गया।
विदेशी मुद्रा बाजार में भी रुपये पर दबाव दिखाई दिया। डॉलर के मुकाबले रुपया 11 पैसे कमजोर होकर 96.36 के स्तर पर पहुंच गया। विश्लेषकों के अनुसार भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर रुपये और चालू खाते के संतुलन पर पड़ता है।
अमेरिका-ईरान तनाव बना मुख्य वजह
क्रूड ऑयल कीमत: बाजार विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल में तेजी की प्रमुख वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव है। क्षेत्र में जारी संघर्ष और तेल आपूर्ति मार्गों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ा दी है।
विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका से बाजार में आपूर्ति संबंधी जोखिम बढ़ा है। यही कारण है कि निवेशकों ने कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आई।
क्रूड ऑयल कीमत: इस वर्ष की शुरुआत में भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने पर ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। बाद में तनाव कम होने से कीमतों में नरमी आई थी, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने बाजार की चिंताओं को फिर बढ़ा दिया है।
भारत का आयात बिल बढ़ने की आशंका
क्रूड ऑयल कीमत: भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर देश के आयात बिल और वित्तीय स्थिति पर पड़ता है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण जून तिमाही में भारत का क्रूड आयात बिल पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत अधिक रहा। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार और तेल विपणन कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ सकता है।
क्रूड ऑयल कीमत: पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं या आगे और बढ़ती हैं, तो घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
हाल के महीनों में तेल विपणन कंपनियां ईंधन की कीमतों में कई बार संशोधन कर चुकी हैं। वर्तमान में दिल्ली में पेट्रोल और डीजल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। यदि वैश्विक बाजार में तेजी जारी रहती है, तो उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

महंगाई बढ़ने का भी खतरा
कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। विशेष रूप से डीजल महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है, जिससे फल, सब्जियां, खाद्यान्न और अन्य रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम भी प्रभावित होते हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि ऊर्जा कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रही, तो खुदरा महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इससे उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित होगी और परिवारों का मासिक बजट भी बढ़ेगा।
आगे क्या?
बाजार की नजर अब मध्य पूर्व के घटनाक्रम और वैश्विक तेल आपूर्ति पर रहेगी। यदि अमेरिका-ईरान तनाव और गहराता है या तेल आपूर्ति में बाधा आती है, तो क्रूड ऑयल कीमत में और तेजी आ सकती है। दूसरी ओर, तनाव कम होने या आपूर्ति सामान्य रहने पर कीमतों में राहत मिलने की संभावना भी बनी रहेगी। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए आने वाले सप्ताह ऊर्जा कीमतों और महंगाई के लिहाज से महत्वपूर्ण रहेंगे।
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