नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): SOFI 2026 रिपोर्ट: भारत ने पिछले एक दशक में खाद्यान्न उत्पादन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति के दम पर खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया है। इसके बावजूद देश के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त अनाज उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि हर परिवार तक किफायती और पौष्टिक भोजन पहुंचाना है। संयुक्त राष्ट्र की पांच प्रमुख एजेंसियों द्वारा जारी ‘स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड (SOFI) 2026’ रिपोर्ट में भारत सहित दुनिया की खाद्य सुरक्षा की बदलती चुनौतियों को रेखांकित किया गया है।
रिपोर्ट बताती है कि कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक स्तर पर भूख और खाद्य असुरक्षा में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है, लेकिन पोषण सुरक्षा का लक्ष्य अभी भी काफी दूर है।
दुनिया में भूख घटी, लेकिन ‘जीरो हंगर’ का लक्ष्य चुनौतीपूर्ण
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में लगातार तीसरे साल वैश्विक स्तर पर भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में कमी दर्ज की गई। अनुमान है कि दुनिया में 64.5 करोड़ लोग, यानी वैश्विक आबादी का 7.8 प्रतिशत, अल्पपोषण का शिकार रहे। यह संख्या वर्ष 2022 के 68.8 करोड़ लोगों की तुलना में कम है।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि मौजूदा गति को देखते हुए 2030 तक सतत विकास लक्ष्य (SDG-2) ‘जीरो हंगर’ हासिल करना कठिन रहेगा।
क्षेत्रीय स्तर पर एशिया और लैटिन अमेरिका में स्थिति में सुधार हुआ है, जबकि अफ्रीका अब भी सबसे अधिक प्रभावित महाद्वीप बना हुआ है। रिपोर्ट का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक दुनिया के 56 प्रतिशत भूखे लोग अकेले अफ्रीका में होंगे।
भारत के लिए नई चुनौती: पोषण सुरक्षा
रिपोर्ट के अनुसार भारत ने रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन, सरकारी खरीद व्यवस्था और दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सब्सिडी योजनाओं में से एक के माध्यम से खाद्यान्न उपलब्धता सुनिश्चित की है। लेकिन अब चुनौती केवल गेहूं और चावल तक सीमित नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ जीवन के लिए लोगों को फल, सब्जियां, दालें, दूध, अंडे और अन्य पोषक खाद्य पदार्थों तक भी सस्ती पहुंच चाहिए। हाल के वर्षों में इन खाद्य पदार्थों की कीमतें अनाज की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ी हैं, जिससे निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए संतुलित आहार खरीदना कठिन होता जा रहा है।
SOFI 2026 रिपोर्ट: पौष्टिक भोजन की लागत लगातार बढ़ रही
SOFI 2026 रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर एक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन स्वस्थ आहार की औसत लागत बढ़कर 4.28 पीपीपी डॉलर हो गई, जबकि यह 2021 में 3.44 पीपीपी डॉलर और 2017 में 2.94 पीपीपी डॉलर थी।
भारत में भी स्वस्थ आहार की अनुमानित लागत 4.11 पीपीपी डॉलर प्रतिदिन आंकी गई है।
| वर्ष | वैश्विक स्वस्थ आहार की औसत लागत (PPP डॉलर/व्यक्ति/दिन) |
|---|---|
| 2017 | 2.94 |
| 2021 | 3.44 |
| 2025 | 4.28 |
| भारत (2025) | 4.11 |
रिपोर्ट में कहा गया है कि पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों की कीमतों का आकलन सामान्य खाद्य मूल्य सूचकांक से नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनकी कीमतें अक्सर अनाज की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ती हैं।
खेत से बाजार तक की लागत बन रही बड़ी वजह
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत का बड़ा हिस्सा खेत में नहीं, बल्कि कटाई के बाद की मूल्य श्रृंखला (Post-harvest Value Chain) में जुड़ा होता है।
रिपोर्ट के अनुसार:
- उपभोक्ता कीमत का 70-75 प्रतिशत हिस्सा भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, थोक व्यापार और वितरण जैसी गतिविधियों से जुड़ा होता है।
- कुल मूल्य श्रृंखला लागत का लगभग 40 प्रतिशत इन्हीं प्रक्रियाओं पर खर्च होता है।
यानी यदि कोल्ड चेन, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक्स और कृषि बाजार अवसंरचना को मजबूत किया जाए, तो फल, सब्जियों और अन्य जल्दी खराब होने वाले खाद्य पदार्थों की कीमतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
कृषि नीति में बदलाव की जरूरत
रिपोर्ट सुझाव देती है कि भविष्य की कृषि नीति का केंद्र केवल गेहूं और चावल का उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। इसके बजाय फल, सब्जियां, दलहन और अन्य पोषणयुक्त फसलों की उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना होगा।
इसके लिए रिपोर्ट ने निम्न क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की सिफारिश की है—

- कृषि अनुसंधान एवं विकास
- गुणवत्तापूर्ण बीज
- आधुनिक सिंचाई
- कृषि विस्तार सेवाएं
- जलवायु-अनुकूल खेती
- कोल्ड चेन और भंडारण
- ग्रामीण परिवहन एवं बाजार अवसंरचना
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी, पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सुधरेगी और उनकी कीमतों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
भारत की नीतियों से मेल खाते सुझाव
रिपोर्ट में दिए गए सुझाव भारत सरकार की कृषि विविधीकरण, बागवानी विस्तार, दलहन एवं तिलहन उत्पादन बढ़ाने और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को मजबूत करने जैसी पहलों के अनुरूप हैं। देश में कुपोषण और मोटापे जैसी दोहरी पोषण चुनौती को देखते हुए कृषि को पोषण-केंद्रित बनाने की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।
खाद्य सुरक्षा का नया अर्थ
SOFI 2026 रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा केवल ‘पर्याप्त अनाज’ तक सीमित नहीं रह सकती। यदि सरकारें कृषि अनुसंधान, सिंचाई, भंडारण, कोल्ड चेन, परिवहन और पोषण-केंद्रित खाद्य प्रणालियों में निवेश नहीं बढ़ातीं, तो पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद करोड़ों लोग स्वस्थ और संतुलित आहार से वंचित रहेंगे। भारत के लिए भी अब अगला लक्ष्य केवल पेट भरना नहीं, बल्कि हर नागरिक को सस्ता, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना होगा।
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