नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): चावल की कीमतों में 20% तेजी: एशिया में चावल की कीमतों में मई के दौरान लगभग दो दशकों की सबसे बड़ी मासिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति में व्यवधान तथा एल नीनो के कारण बढ़ते मौसमीय जोखिमों ने उत्पादन लागत और सप्लाई को प्रभावित किया है। इसके चलते आने वाले महीनों में चावल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
थाईलैंड के सफेद चावल, जिसे एशियाई बाजार का प्रमुख बेंचमार्क माना जाता है, की कीमत मई में करीब 20 प्रतिशत बढ़ी। यह वृद्धि 2008 के बाद किसी एक महीने में दर्ज की गई सबसे बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है। वहीं, शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (CBOT) पर चावल वायदा भी मई में लगभग 15 प्रतिशत चढ़ गया।
चावल की कीमतों पर एल नीनो और युद्ध का दोहरा असर
फिच सॉल्यूशंस की इकाई BMI के कमोडिटी विश्लेषक बिन हुई ओंग के अनुसार, चावल की कीमतों में बढ़ोतरी का दौर अभी जारी रह सकता है। उन्होंने कहा कि संभावित एल नीनो प्रभाव एशिया के कई हिस्सों में गर्म और शुष्क मौसम ला सकता है, जिससे धान उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
दूसरी ओर, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनावपूर्ण हालात के कारण ईंधन और उर्वरकों की आपूर्ति बाधित हुई है। एशियाई देशों के अधिकांश किसान आयातित उर्वरकों पर निर्भर हैं। ऐसे में बढ़ती लागत सीधे कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रही है।
किसानों के सामने बढ़ी चुनौती
एशिया वैश्विक चावल उत्पादन और निर्यात का प्रमुख केंद्र है। थाईलैंड, वियतनाम और भारत जैसे देश दुनिया के बड़े चावल निर्यातकों में शामिल हैं। ऐसे समय में जब मुख्य खरीफ सीजन की बुवाई शुरू हो रही है, कई किसानों को बढ़ती लागत और मौसम की अनिश्चितता के कारण फैसले बदलने पड़ रहे हैं।
दक्षिणी वियतनाम के विन्ह लॉन्ग प्रांत के किसान ट्रान वैन बे, जो सामान्यतः साल में तीन फसलें लेते हैं, इस बार एक फसल छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि उर्वरकों की बढ़ती कीमतें और अत्यधिक गर्म मौसम नई फसल की बुवाई को जोखिमपूर्ण बना रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार चावल एक ऐसी फसल है जिसमें उर्वरकों की खपत अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसके अलावा खेतों में सिंचाई के लिए उपयोग होने वाले अधिकांश पंप डीजल से संचालित होते हैं। ऐसे में ईंधन और उर्वरक दोनों की महंगाई किसानों की लागत को तेजी से बढ़ा रही है।
उर्वरक कीमतों में 50% तक उछाल
इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से थाईलैंड, कंबोडिया और फिलीपींस में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की कीमतों में 40 से 50 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।
संस्थान में नीति विश्लेषण और जलवायु परिवर्तन के वरिष्ठ वैज्ञानिक अलीशेर मिर्जाबाएव ने कहा कि मार्च से मई के दौरान अधिकांश देशों के पास पर्याप्त भंडार मौजूद था, लेकिन यदि उर्वरक व्यापार जल्द सामान्य नहीं हुआ तो आने वाले महीनों में आपूर्ति संकट पैदा हो सकता है।

चावल की कीमतों का असर वैश्विक आपूर्ति पर संभव
एशिया में उत्पादन में किसी भी प्रकार की कमी का सीधा असर वैश्विक चावल बाजार पर पड़ सकता है। फिलीपींस सरकार पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि यदि एल नीनो का प्रभाव मजबूत रहा तो देश का धान उत्पादन 7 लाख टन तक घट सकता है। यह उसके वार्षिक उत्पादन लक्ष्य का लगभग 3.5 प्रतिशत है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी को सीमित करने वाले कारक भी मौजूद हैं। इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल के मार्केट विश्लेषक पीटर क्लब के अनुसार, भारत सहित बड़े उत्पादक देशों के पास पर्याप्त चावल भंडार है। इसके अलावा वैश्विक मांग भी फिलहाल अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगले कुछ महीनों में मौसम की स्थिति, उर्वरक आपूर्ति और मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक हालात चावल बाजार की दिशा तय करेंगे। यदि एल नीनो का प्रभाव गहराता है और ऊर्जा संकट जारी रहता है, तो एशिया ही नहीं बल्कि वैश्विक खाद्य बाजारों में भी महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। वहीं पर्याप्त भंडार और कमजोर मांग फिलहाल कीमतों में अत्यधिक उछाल को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं।
फिलहाल, कृषि क्षेत्र और खाद्य सुरक्षा से जुड़े नीति-निर्माताओं की नजरें मौसम और आपूर्ति श्रृंखला के आगामी घटनाक्रमों पर टिकी हुई हैं।
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