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मीठे ज्वार से इथेनॉल उत्पादन परियोजना विवादों में, IIMR ने प्रोजेक्ट से अलग होने के संकेत दिए

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): मीठे ज्वार से इथेनॉल उत्पादन परियोजना देश में इथेनॉल उत्पादन के लिए वैकल्पिक फीड स्टॉक की तलाश के बीच मीठे ज्वार (स्वीट सोरगम) आधारित एक महत्वपूर्ण परियोजना विवादों में घिर गई है। कानपुर स्थित नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट्स रिसर्च के बीच इस परियोजना को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। परियोजना को भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड से वित्तीय सहयोग मिल रहा है।

यह परियोजना देश में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के तहत ज्वार को संभावित फीड स्टॉक के रूप में विकसित करने की दिशा में शुरू की गई थी। लेकिन अब ट्रायल प्रक्रिया, वैज्ञानिक मानकों और निजी बीज कंपनी की भूमिका को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।

‘मेगास्वीट’ हाईब्रिड पर उठे सवाल

परियोजना के केंद्र में निजी बीज कंपनी एडवांटा की हाईब्रिड ज्वार किस्म ‘मेगास्वीट’ है। इसी किस्म के इस्तेमाल को लेकर IIMR ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। संस्थान का कहना है कि ‘मेगास्वीट’ को भारत सरकार ने फॉरेज सोरगम यानी चारे वाली ज्वार के रूप में अधिसूचित किया था, न कि स्वीट सोरगम हाईब्रिड के रूप में।

IIMR के अनुसार, इस हाईब्रिड का ICAR–AICRP प्रणाली के तहत कभी व्यापक मूल्यांकन नहीं किया गया। ऐसे में इसे सीधे इथेनॉल उत्पादन के लिए बढ़ावा देना वैज्ञानिक प्रक्रिया और पारदर्शिता के खिलाफ माना जा रहा है।

IIMR ने जताई प्रोजेक्ट से अलग होने की मंशा

हैदराबाद स्थित IIMR ने 24 मार्च 2026 को NSI को पत्र लिखकर परियोजना के मौजूदा प्रारूप पर असहमति जताई थी। संस्थान ने स्पष्ट किया कि वर्तमान स्वरूप में यह परियोजना वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप नहीं दिखाई देती और इसलिए वह BPCL-NSI स्वीट सोरगम प्रोजेक्ट से तत्काल प्रभाव से हटना चाहता है।

मीठे ज्वार से इथेनॉल उत्पादन
मीठे ज्वार से इथेनॉल उत्पादन परियोजना विवादों में, IIMR ने उठाए वैज्ञानिक प्रक्रिया पर सवाल

हालांकि, इसके जवाब में NSI की निदेशक ने 2 अप्रैल 2026 को पत्र भेजकर IIMR की चिंताओं को खारिज किया और संस्थान से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया। लेकिन IIMR ने 15 अप्रैल को फिर पत्र भेजकर अपनी आपत्तियां दोहराईं और परियोजना से अलग होने के निर्णय पर कायम रहने की बात कही।

ट्रायल प्रक्रिया पर भी गंभीर आपत्तियां

IIMR ने खरीफ 2025 के दौरान कर्नाटक के निरानी शुगर्स और महाराष्ट्र के एनएसएल जय महेश शुगर्स लिमिटेड में हुए ट्रायल्स की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं।

संस्थान के मुताबिक ट्रायल्स के दौरान स्थापित कृषि सिद्धांतों और ICAR की अनुशंसित “पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज” का पालन नहीं किया गया। आरोप है कि बीज की मात्रा, पौधों के बीच दूरी और फसल प्रबंधन जैसे मानकों की अनदेखी की गई।

IIMR ने यह भी कहा कि कई जगहों पर अनाज की अलग कटाई नहीं की गई, जिससे डेटा की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ट्रायल्स निर्धारित मानकों के अनुसार नहीं होंगे, तो उनसे प्राप्त निष्कर्ष भी संदिग्ध रहेंगे।

मीठे ज्वार से इथेनॉल उत्पादन परियोजना को लेकर नाराजगी

IIMR ने इस बात पर भी असंतोष जताया है कि किसानों के प्रशिक्षण और तकनीकी निगरानी जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियां संस्थान की प्रभावी भागीदारी के बिना संचालित की गईं। संस्थान का कहना है कि ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक निगरानी कमजोर पड़ जाती है।

विवाद के प्रमुख मुद्दे

  • IIMR ने परियोजना में इस्तेमाल की जा रही ‘मेगास्वीट’ हाईब्रिड ज्वार किस्म पर गंभीर सवाल उठाए हैं। संस्थान का कहना है कि इस किस्म का ICAR-AICRP प्रणाली के तहत व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं किया गया, बावजूद इसके इसे स्वीट सोरगम के तौर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा खरीफ 2025 के दौरान किए गए ट्रायल्स में वैज्ञानिक मानकों और ICAR के निर्धारित कृषि दिशानिर्देशों का पालन नहीं किए जाने पर भी आपत्ति जताई गई है।
  • IIMR के अनुसार बीज की मात्रा, पौधों के बीच दूरी और फसल प्रबंधन जैसे मानकों की अनदेखी से ट्रायल्स के परिणामों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। संस्थान ने यह भी कहा कि किसानों के प्रशिक्षण और तकनीकी निगरानी जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियों में उसकी प्रभावी भागीदारी नहीं रही।
  • IIMR का मानना है कि पर्याप्त मल्टीलोकेशन परीक्षण और स्वतंत्र वैज्ञानिक डेटा के बिना किसी हाईब्रिड किस्म को बड़े पैमाने पर इथेनॉल उत्पादन के लिए बढ़ावा देना उचित नहीं होगा।

इथेनॉल नीति पर पड़ सकता है असर

भारत सरकार 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य को हासिल करने के लिए गन्ने और मक्का के अलावा वैकल्पिक फीड स्टॉक तलाश रही है। ऐसे में स्वीट सोरगम को संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा था क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम पानी में भी उगाया जा सकता है।

लेकिन मीठे ज्वार से इथेनॉल उत्पादन परियोजना में पैदा हुए विवाद ने वैज्ञानिक प्रक्रिया और निजी कंपनियों की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है। आईसीएआर से जुड़े सूत्रों के मुताबिक यदि परियोजना ICAR के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं चलती, तो IIMR जैसे संस्थानों का इसके साथ बने रहना मुश्किल होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इथेनॉल उत्पादन जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ज्वार जैसे किसी भी नई फसल या तकनीक को बढ़ावा देने से पहले व्यापक और पारदर्शी वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी हैं, ताकि किसानों और उद्योग दोनों के हित सुरक्षित रह सकें।

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