नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिकों ने इस साल एक सामान्य अलनीनो नहीं बल्कि संभावित “सुपर अलनीनो” को लेकर चेतावनी जारी की है। मौजूदा आकलनों के अनुसार जहां अलनीनो बनने की संभावना लगभग 62 प्रतिशत है, वहीं सुपर अलनीनो बनने की आशंका भी 25 प्रतिशत तक पहुंच गई है। अगर यह स्थिति बनती है, तो वैश्विक मौसम पैटर्न में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
भारत में भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने पहले ही सामान्य से कम, लगभग 92 प्रतिशत मानसून का अनुमान जताया है। इसके पीछे जून के बाद विकसित होने वाली अलनीनो स्थितियों को मुख्य कारण माना जा रहा है।
सुपर अलनीनो क्या है और क्यों बढ़ रही चिंता?

एलनीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) एक जलवायु प्रणाली है जिसमें तीन अवस्थाएं होती हैं—अलनीनो, ला नीना और तटस्थ स्थिति। अलनीनो तब बनता है जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है।
सुपर अलनीनो इसी प्रक्रिया का अत्यधिक रूप है, जिसमें समुद्र की सतह का तापमान औसत से कम से कम 2°C ज्यादा हो जाता है। यह दुर्लभ घटना है, लेकिन जब होती है तो इसके प्रभाव व्यापक और तीव्र होते हैं।
अमेरिका के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, इस साल शरद ऋतु या सर्दियों तक सुपर अलनीनो बनने की संभावना बनी हुई है। हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि वसंत ऋतु के दौरान पूर्वानुमान अक्सर अनिश्चित रहते हैं।
वैश्विक प्रभाव: कहीं सूखा, कहीं बाढ़
अलनीनो और विशेष रूप से सुपर अलनीनो का असर पूरी दुनिया पर अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। यह जेट स्ट्रीम को प्रभावित करता है, जिससे बारिश के पैटर्न बदल जाते हैं।
भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में सूखा और गर्मी बढ़ सकती है, जबकि अमेरिका और कुछ एशियाई क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है। इसके अलावा, वैश्विक तापमान में अस्थायी लेकिन तीव्र वृद्धि भी देखी जाती है।
संभावनाएं और पूर्वानुमान
मौजूदा वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार इस वर्ष मौसमीय परिस्थितियां तेजी से बदलती हुई नजर आ रही हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अलनीनो विकसित होने की संभावना लगभग 62 प्रतिशत है, जिसके चलते तापमान में वृद्धि और मानसून के कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है।
इसके साथ ही लगभग 25 प्रतिशत संभावना सुपर अलनीनो बनने की भी है, जो स्थिति को और गंभीर बना सकती है—ऐसे में चरम गर्मी, लंबे सूखे और कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएं देखने को मिल सकती हैं। वहीं शेष परिस्थितियों में तटस्थ स्थिति रहने की संभावना है, जिसमें मौसम अपेक्षाकृत सामान्य बना रह सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले महीनों में ये संभावनाएं और स्पष्ट होंगी, क्योंकि वसंत ऋतु के दौरान जलवायु पूर्वानुमान अक्सर बदलते रहते हैं।
वैज्ञानिकों की चेतावनी
अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क के प्रोफेसर डॉ. पॉल राउंडी का मानना है कि पिछले 140 वर्षों में सबसे शक्तिशाली अलनीनो की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं, विश्व मौसम संगठन की महासचिव सेलेस्ते साउलो ने बताया कि हालिया अलनीनो घटनाओं ने पहले ही वैश्विक तापमान रिकॉर्ड तोड़ने में भूमिका निभाई है।
2015 का अनुभव: एक चेतावनी
इससे पहले 2015 में आए सुपर अलनीनो ने दुनिया भर में गंभीर असर डाला था। अफ्रीका में सूखा, कैरेबियाई देशों में जल संकट और प्रशांत क्षेत्र में तूफानों की तीव्रता बढ़ गई थी। यह उदाहरण बताता है कि अगर 2026 में सुपर अलनीनो आता है, तो उसके प्रभाव और भी व्यापक हो सकते हैं।
अनिश्चितता के बीच बढ़ती तैयारी
हालांकि पूर्वानुमानों में अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है, लेकिन संकेत स्पष्ट हैं कि मौसम में बड़े बदलाव हो सकते हैं। ऐसे में सरकारों और समाज को संभावित आपदाओं के लिए तैयार रहना होगा—चाहे वह जल संकट हो, कृषि पर असर हो या शहरी बाढ़ का खतरा।
आने वाले महीनों में वैज्ञानिक डेटा और स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल एक बात तय है—2026 का मौसम सामान्य नहीं रहने वाला।
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