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केरल पहुंचा मानसून, दिल्ली में येलो अलर्ट; इस साल कम रह सकती है बारिश: IMD

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मानसून

मुंबई (कृषि भूमि ब्यूरो): भारत में बहुप्रतीक्षित दक्षिण-पश्चिम मानसून ने आखिरकार 4 जून को केरल में दस्तक दे दी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने इसकी आधिकारिक पुष्टि करते हुए देश के चार महीने लंबे वर्षा मौसम की शुरुआत की घोषणा की। हालांकि इस बार मानसून सामान्य तिथि 1 जून की तुलना में तीन दिन की देरी से पहुंचा है। इससे पहले मौसम विभाग ने अनुमान लगाया था कि मानसून 26 मई तक केरल पहुंच सकता है, लेकिन मौसमीय परिस्थितियों के कारण इसके आगमन में विलंब हुआ।

मानसून के केरल पहुंचते ही राज्य के कई हिस्सों में भारी बारिश दर्ज की गई है। लगातार वर्षा के चलते कई जिलों में अलर्ट जारी किया गया है। वहीं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी मौसम का मिजाज बदलने के संकेत मिले हैं और आईएमडी ने बारिश तथा गरज-चमक की संभावना को देखते हुए येलो अलर्ट जारी किया है।

केरल में भारी बारिश, कई जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट

मौसम विभाग के अनुसार मानसून ने केरल और माहे के साथ-साथ लक्षद्वीप, कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों, कोमोरिन क्षेत्र के शेष भागों तथा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के कई क्षेत्रों में भी आगे बढ़त दर्ज की है।

बुधवार रात से शुरू हुई तेज बारिश के बाद आईएमडी ने केरल के अलप्पुझा, कोट्टायम और एर्नाकुलम जिलों के लिए तीन घंटे का ऑरेंज अलर्ट जारी किया। विभाग ने चेतावनी दी है कि इन क्षेत्रों में भारी वर्षा, जलभराव और स्थानीय स्तर पर यातायात प्रभावित होने जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।

राज्य प्रशासन को भी सतर्क रहने और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को आवश्यक सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

दिल्ली में बदलेगा मौसम, बारिश की संभावना

दिल्ली-एनसीआर में भी मौसम विभाग ने बारिश और आंधी-तूफान की संभावना जताई है। गुरुवार को राजधानी का न्यूनतम तापमान 29.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने का अनुमान है।

येलो अलर्ट का अर्थ है कि नागरिक मौसम संबंधी गतिविधियों के प्रति सतर्क रहें। मौसम विभाग के अनुसार अगले कुछ दिनों में हल्की से मध्यम बारिश और तेज हवाएं चल सकती हैं, जिससे भीषण गर्मी से कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।

देश की अर्थव्यवस्था और कृषि के लिए अहम है मानसून

भारत में मानसून का महत्व केवल मौसम तक सीमित नहीं है। देश की लगभग 70 प्रतिशत वार्षिक वर्षा जून से सितंबर के बीच होने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है। कृषि क्षेत्र, जलाशयों का जलस्तर, पेयजल उपलब्धता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बिजली उत्पादन जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्र सीधे तौर पर मानसून के प्रदर्शन से प्रभावित होते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर और पर्याप्त वर्षा कृषि उत्पादन को मजबूत बनाती है, जबकि कमजोर मानसून खाद्य उत्पादन और महंगाई पर असर डाल सकता है।

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इस वर्ष सामान्य से कम बारिश की आशंका

मानसून के आगमन के साथ ही पूरे सीजन के प्रदर्शन को लेकर चिंता भी बढ़ गई है। आईएमडी ने हाल ही में अपने संशोधित पूर्वानुमान में कहा है कि जून से सितंबर के बीच देश में वर्षा दीर्घकालिक औसत (एलपीए) के लगभग 90 प्रतिशत रहने की संभावना है।

भारत के लिए 1971-2020 अवधि के आधार पर मौसमी वर्षा का दीर्घकालिक औसत 87 सेंटीमीटर माना जाता है। मौसम विभाग के अनुसार यदि कुल वर्षा एलपीए के 90 प्रतिशत से कम रहती है, तो उसे “सामान्य से कम” अथवा “डिफिशिएंट” श्रेणी में रखा जाता है।

मानकआंकड़ा
मानसून आगमन की सामान्य तिथि1 जून
वास्तविक आगमन तिथि4 जून
देरी3 दिन
दीर्घकालिक औसत वर्षा (LPA)87 सेमी
अनुमानित वर्षाLPA का लगभग 90%

अल नीनो बढ़ा सकता है चुनौती

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष वर्षा में संभावित कमी का प्रमुख कारण अल नीनो की विकसित होती परिस्थितियां हो सकती हैं। आईएमडी का कहना है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) की स्थिति धीरे-धीरे अल नीनो की ओर बढ़ रही है।

आमतौर पर अल नीनो का संबंध भारत में कमजोर मानसून और कम वर्षा से माना जाता है। मौसम विभाग का अनुमान है कि जून के दौरान इसका प्रभाव सीमित रहेगा, लेकिन सितंबर तक यह मध्यम से मजबूत स्तर तक पहुंच सकता है। ऐसे में मानसून के अंतिम चरण में वर्षा वितरण प्रभावित होने की संभावना बनी हुई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में मानसून की प्रगति और प्रशांत महासागर की परिस्थितियों पर लगातार नजर रखी जाएगी, क्योंकि यही कारक देशभर में वर्षा के पैटर्न और कृषि गतिविधियों को प्रभावित करेंगे।

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