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अल नीनो और ईरान संकट की दोहरी मार का खतरा, महंगी हो सकती है खेती; खाद और फसल लागत बढ़ने की आशंका

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): अल नीनो और ईरान संकट का कृषि पर असरदेश में पहले से ही कमजोर मानसून की आशंकाओं के बीच कृषि क्षेत्र के सामने एक नई चुनौती उभरती दिखाई दे रही है। मौसम वैज्ञानिक जहां अल नीनो के प्रभाव से वर्षा में कमी की संभावना जता रहे हैं, वहीं पश्चिम एशिया में जारी ईरान संकट वैश्विक उर्वरक और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों कारकों का संयुक्त असर खेती की लागत, फसल उत्पादन और खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खरीफ सीजन की बुवाई शुरू होने वाली है। ऐसे समय में यदि खाद, डीजल और अन्य कृषि इनपुट महंगे होते हैं, तो किसानों की लागत बढ़ सकती है और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

अल नीनो से कमजोर पड़ सकता है मानसून

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) पहले ही संकेत दे चुका है कि 2026 का मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। विभाग ने इस वर्ष वर्षा को दीर्घकालिक औसत (एलपीए) के लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले 11 वर्षों में सबसे कमजोर मानसून साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो की स्थिति विकसित होने पर भारत में वर्षा वितरण प्रभावित होता है। इसका असर विशेष रूप से धान, दालें, तिलहन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ सकता है। एशिया के कई देशों में पहले से ही गर्म और शुष्क मौसम फसल उत्पादन को प्रभावित कर रहा है।

ईरान संकट से बढ़ रही खाद और ईंधन की चिंता

दूसरी ओर, ईरान संकट ने वैश्विक उर्वरक बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक यूरिया, अमोनिया और अन्य उर्वरकों की आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। इस क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने से खाद की कीमतों में तेजी देखी जा रही है।

हाल के महीनों में कई देशों ने उर्वरक कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की है। वैश्विक स्तर पर उर्वरकों और ईंधन की लागत बढ़ने से किसानों के लिए खेती महंगी होती जा रही है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के कई हिस्सों में किसान महंगे खाद और डीजल के कारण फसल पैटर्न बदलने पर विचार कर रहे हैं।

भारतीय किसानों पर क्या होगा असर?

भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उछाल का असर घरेलू कृषि लागत पर पड़ सकता है। हालांकि सरकार और उर्वरक क्षेत्र की संस्थाओं का कहना है कि फिलहाल देश में खाद का पर्याप्त भंडार मौजूद है और किसानों को तत्काल कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

अल नीनो
अल नीनो की आशंका और वैश्विक उर्वरक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच किसानों के सामने लागत बढ़ने की चुनौती खड़ी हो सकती है।

इसके बावजूद यदि वैश्विक कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है और कृषि क्षेत्र की लागत संरचना प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण किसान उर्वरकों का कम उपयोग कर सकते हैं, जिससे फसल उत्पादकता पर असर पड़ने का खतरा है।

खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कमजोर मानसून और महंगे कृषि इनपुट की स्थिति एक साथ बनी रहती है, तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। वैश्विक स्तर पर गेहूं और चावल जैसी प्रमुख फसलों की कीमतों में पहले ही तेजी देखी जा रही है। कई देशों में उत्पादन घटने की आशंका के चलते खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है।

आगे क्या?

फिलहाल भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए स्थिति पूरी तरह चिंताजनक नहीं कही जा सकती, क्योंकि खाद का घरेलू स्टॉक पर्याप्त बताया जा रहा है और मानसून अभी शुरुआती चरण में है। लेकिन आने वाले महीनों में अल नीनो की तीव्रता, मानसून की प्रगति और पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति पर किसानों, नीति निर्माताओं और कृषि उद्योग की नजर बनी रहेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है और वैश्विक उर्वरक बाजार में अस्थिरता जारी रहती है, तो 2026-27 का कृषि सीजन लागत और उत्पादन दोनों मोर्चों पर चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

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