नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): भारत में थोक महंगाई (Wholesale Price Index-WPI) जून 2026 में बढ़कर 9.87 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो सितंबर 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले सितंबर 2022 में थोक महंगाई दर 10.7 प्रतिशत दर्ज की गई थी। मई 2026 में यह 9.68 प्रतिशत थी, जबकि जून 2025 में थोक महंगाई दर -0.4 प्रतिशत के निचले स्तर पर थी। लगातार बढ़ती खाद्य और ईंधन की कीमतों के कारण महंगाई का दबाव और गहरा हुआ है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जून में खाद्य वस्तुओं, कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और कई औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली। इसका असर थोक मूल्य सूचकांक पर साफ दिखाई दिया।
खाद्य महंगाई ने बढ़ाई चिंता
थोक महंगाई सूचकांक में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग 24.99 प्रतिशत है, इसलिए इनके दामों में बदलाव का समग्र महंगाई पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। जून 2026 में खाद्य पदार्थों की थोक महंगाई बढ़कर 6.14 प्रतिशत हो गई, जो फरवरी 2025 के बाद सबसे अधिक है।
खाद्य महंगाई में फरवरी 2026 से लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इससे पहले जून 2025 से जनवरी 2026 के बीच आठ महीनों में से छह महीनों तक खाद्य महंगाई शून्य से नीचे रही थी, लेकिन अब कीमतों में तेजी लौट आई है।
प्राथमिक और प्रसंस्कृत खाद्य वस्तुओं दोनों के दाम बढ़े
खाद्य वस्तुओं को दो प्रमुख श्रेणियों—प्राथमिक खाद्य वस्तुएं और विनिर्मित (मैन्युफैक्चर्ड) खाद्य उत्पाद—में बांटा जाता है।
जून 2026 में प्राथमिक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 5.49 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि मई में यह बढ़ोतरी 3.60 प्रतिशत थी। दूसरी ओर, मैन्युफैक्चर्ड खाद्य पदार्थों की कीमतें 7.20 प्रतिशत बढ़ीं। पेय पदार्थों की कीमतों में भी 1.44 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, हालांकि यह मई के 1.64 प्रतिशत की तुलना में कुछ कम रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य महंगाई में लगातार बढ़ोतरी का असर खुदरा बाजार और उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर भी देखने को मिल सकता है।
ईंधन और ऊर्जा सबसे बड़े कारक
जून के दौरान ईंधन एवं बिजली श्रेणी में 27.41 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस श्रेणी में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें 34.75 प्रतिशत तक बढ़ीं, जिसने परिवहन, उत्पादन और औद्योगिक लागत को प्रभावित किया।
ऊर्जा लागत बढ़ने से विभिन्न उद्योगों की उत्पादन लागत में भी इजाफा हुआ, जिसका असर अन्य विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई दिया।

औद्योगिक उत्पाद भी हुए महंगे
खाद्य और ईंधन के अलावा कई औद्योगिक क्षेत्रों में भी कीमतों में दोहरे अंक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
- टेक्सटाइल उत्पादों की कीमतें 10.85 प्रतिशत बढ़ीं।
- रसायन एवं रासायनिक उत्पाद 12.78 प्रतिशत महंगे हुए।
- बेसिक मेटल्स में 12.31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
- बिजली उपकरणों की कीमतों में 11.03 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
इन क्षेत्रों में बढ़ती लागत का असर आने वाले महीनों में उपभोक्ता वस्तुओं और निर्माण गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।
अप्रैल-जून तिमाही में भी तेज रही महंगाई
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में औसत थोक महंगाई 9.37 प्रतिशत रही। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह लगभग शून्य थी, जबकि अप्रैल-जून 2024 में 1.72 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
तिमाही के दौरान फूड इंडेक्स में औसतन 4.67 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसमें प्राथमिक खाद्य वस्तुओं की कीमतें 3.87 प्रतिशत, मैन्युफैक्चर्ड खाद्य उत्पादों की कीमतें 5.95 प्रतिशत और पेय पदार्थों की कीमतें 1.16 प्रतिशत बढ़ीं।
आगे क्या रहेगा असर?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और ऊर्जा की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तथा खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति में अपेक्षित सुधार नहीं होता, तो आने वाले महीनों में थोक महंगाई पर दबाव बना रह सकता है। थोक स्तर पर बढ़ती कीमतें धीरे-धीरे खुदरा महंगाई में भी परिलक्षित हो सकती हैं, जिससे उपभोक्ताओं और उद्योगों दोनों पर लागत का बोझ बढ़ने की आशंका है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की आगे की नीतियां महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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