नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): खाद्य तेल आयात: भारत की खाद्य तेलों के मामले में आयात पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है। चालू तेल वर्ष (नवंबर 2025 से जून 2026) के पहले आठ महीनों में देश का कुल खाद्य तेल आयात 7 प्रतिशत बढ़कर 103.88 लाख टन पहुंच गया। हालांकि, जून 2026 के दौरान आयात में सालाना आधार पर 29 प्रतिशत की उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि पाम तेल और अन्य सॉफ्ट ऑयल के बीच घटते मूल्य अंतर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों तथा रुपये की कमजोरी ने आयात को प्रभावित किया है।
खाद्य तेल उद्योग के संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2025 से जून 2026 के दौरान देश का कुल वनस्पति तेल (खाद्य एवं अखाद्य) आयात 6 प्रतिशत बढ़कर 105.71 लाख टन रहा।
पाम तेल की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी
आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में भारत ने 49.42 लाख टन कच्चे पाम तेल का आयात किया, जो कुल खाद्य तेल आयात में सबसे बड़ा हिस्सा रहा। इसके अलावा 32.73 लाख टन सोयाबीन तेल तथा 20.94 लाख टन सूरजमुखी तेल का आयात किया गया।
पाम तेल का कुल आयात बढ़कर 50.12 लाख टन पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह 42.94 लाख टन था। इसके साथ ही कुल खाद्य तेल आयात में पाम तेल की हिस्सेदारी 44 प्रतिशत से बढ़कर 48 प्रतिशत हो गई।
दूसरी ओर, सोयाबीन और सूरजमुखी जैसे सॉफ्ट ऑयल का आयात मामूली घटकर 53.76 लाख टन रह गया, जिससे इनकी हिस्सेदारी 56 प्रतिशत से घटकर 52 प्रतिशत पर आ गई।
जून में आयात में तेज गिरावट
जून 2026 में भारत का कुल वनस्पति तेल आयात घटकर 11.47 लाख टन रह गया, जबकि जून 2025 में यह 16.16 लाख टन था। इसमें 11.11 लाख टन खाद्य तेल और 35,427 टन अखाद्य तेल शामिल रहे।
मासिक आधार पर भी खाद्य तेल आयात मई के 13.39 लाख टन से घटकर जून में 11.11 लाख टन रह गया।
पाम तेल का आयात जून में 4.87 लाख टन रहा, जो मई की तुलना में 10.5 प्रतिशत कम है। वहीं, सोयाबीन तेल का आयात 4.94 लाख टन से घटकर 3.81 लाख टन रह गया, जिसमें 23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
कीमतों का अंतर घटने से मांग प्रभावित
एसईए के अनुसार, पाम तेल और सॉफ्ट ऑयल के बीच मूल्य अंतर तेजी से कम हुआ है। पहले जहां पाम तेल अन्य खाद्य तेलों की तुलना में काफी सस्ता था, वहीं अब इसका मूल्य लाभ घटकर 50 डॉलर प्रति टन से भी कम रह गया है। इससे पाम तेल की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कमजोर हुई और आयातकों की खरीद प्रभावित हुई।
इसके अलावा इंडोनेशिया, मलेशिया और अमेरिका में लागू बायोफ्यूल ब्लेंडिंग नीतियों के कारण बड़ी मात्रा में वनस्पति तेल खाद्य उपयोग के बजाय ईंधन क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
नेपाल से रिफाइंड तेल का आयात जारी
नेपाल से भारत में रिफाइंड खाद्य तेल का आयात भी लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच नेपाल ने लगभग 3.39 लाख टन रिफाइंड खाद्य तेल भारत को निर्यात किया, जिसमें अधिकांश हिस्सा रिफाइंड सोयाबीन तेल का रहा।
मई 2026 में नेपाल से करीब 54 हजार टन और जून में लगभग 32 हजार टन रिफाइंड खाद्य तेल भारत पहुंचा। दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौता (SAFTA) के तहत इन आयातों पर शून्य आयात शुल्क का लाभ मिलता है।
घरेलू स्टॉक में कमी
कम आयात का असर घरेलू भंडार पर भी दिखाई दिया। 1 जुलाई 2026 तक देश के बंदरगाहों पर खाद्य तेल का स्टॉक 9.06 लाख टन और पाइपलाइन स्टॉक 11.03 लाख टन रहा। इस प्रकार कुल उपलब्ध स्टॉक 20.09 लाख टन रहा, जो एक महीने पहले के 22.16 लाख टन की तुलना में 2.07 लाख टन कम है।

कच्चे तेल का आयात बढ़ा, रिफाइंड तेल घटा
आठ महीनों के दौरान कच्चे खाद्य तेल का आयात बढ़कर 100.19 लाख टन पहुंच गया, जबकि रिफाइंड खाद्य तेल का आयात घटकर केवल 3.69 लाख टन रह गया। कुल आयात में रिफाइंड तेल की हिस्सेदारी घटकर 4 प्रतिशत रह गई, जबकि कच्चे खाद्य तेल की हिस्सेदारी बढ़कर 96 प्रतिशत हो गई।
अर्जेंटीना सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता
इस अवधि में अर्जेंटीना भारत का सबसे बड़ा खाद्य तेल आपूर्तिकर्ता रहा, जहां से 23.39 लाख टन खाद्य तेल आयात किया गया। इसके बाद मलेशिया (19.81 लाख टन) और इंडोनेशिया (19.04 लाख टन) का स्थान रहा। रूस, ब्राजील, थाईलैंड, यूक्रेन, चीन, नेपाल और संयुक्त अरब अमीरात भी प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहे।
अंतरराष्ट्रीय कीमतों और रुपये की कमजोरी का असर
जून 2026 में कच्चे पाम तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत सालाना आधार पर 17 प्रतिशत, आरबीडी पामोलीन 18 प्रतिशत, सोयाबीन तेल 14 प्रतिशत और सूरजमुखी तेल 19 प्रतिशत महंगा रहा। वहीं, पिछले एक वर्ष में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में 11 प्रतिशत से अधिक की कमजोरी दर्ज की गई, जिससे खाद्य तेल आयात की लागत और बढ़ गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी नहीं आती और रुपये पर दबाव बना रहता है, तो आने वाले महीनों में भारत के खाद्य तेल आयात और घरेलू बाजार दोनों पर इसका प्रभाव जारी रह सकता है।
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