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हिमाचल में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा: गेहूं का MSP 80 रुपये प्रति किलो, किसानों को बड़ी राहत

धर्मशाला (कृषि भूमि ब्यूरो): हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए कई प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में उल्लेखनीय वृद्धि की घोषणा की है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखु की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई, जिसका सीधा लाभ राज्य के हजारों किसानों को मिलने की उम्मीद है।

सरकार का यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब देशभर में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। हिमाचल पहले ही प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में अग्रणी राज्यों में गिना जाता है, और इस फैसले से इस दिशा को और मजबूती मिलेगी।

प्राकृतिक खेती
हिमाचल प्राकृतिक खेती: MSP में ऐतिहासिक बढ़ोतरी

MSP में कितना हुआ इजाफा?

राज्य सरकार द्वारा घोषित नई दरों के अनुसार गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 60 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया है। इसी तरह मक्का का MSP 40 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये प्रति किलोग्राम किया गया है। चंबा जिले की पांगी घाटी में उगाई जाने वाली जौ के समर्थन मूल्य में भी वृद्धि करते हुए इसे 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया है।

कच्ची हल्दी के MSP में सबसे बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली है, जिसे 90 रुपये से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया है। इसके अलावा अदरक की खरीद अब 30 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से की जाएगी, जिससे इस फसल के उत्पादकों को भी सीधा लाभ मिलेगा। खासतौर पर हल्दी और गेहूं में सबसे ज्यादा वृद्धि की गई है, जो किसानों के लिए आर्थिक रूप से काफी लाभकारी साबित हो सकती है।

किसानों की आय बढ़ाने पर फोकस

राज्य सरकार का मानना है कि MSP में यह बढ़ोतरी किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करेगी। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से होने वाले नुकसान को देखते हुए सरकार लंबे समय से वैकल्पिक खेती मॉडल को बढ़ावा दे रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती है, बल्कि उत्पादन लागत को भी कम करती है। ऐसे में MSP बढ़ने से किसानों को दोहरा लाभ मिलेगा—कम लागत और अधिक दाम।

पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि की दिशा में कदम

हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यहां पर्यावरण संरक्षण बेहद महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक खेती के जरिए न केवल भूमि और जल संसाधनों की रक्षा की जा सकती है, बल्कि जैव विविधता को भी संरक्षित रखा जा सकता है।

सरकार का यह कदम जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञ इसे “सस्टेनेबल एग्रीकल्चर मॉडल” की ओर बढ़ता हुआ ठोस कदम बता रहे हैं।

रोजगार के अवसरों को भी मिली मंजूरी

कृषि सुधारों के साथ-साथ राज्य कैबिनेट ने रोजगार सृजन पर भी ध्यान दिया है। बैठक में 1,500 सरकारी पदों के सृजन और भर्ती को मंजूरी दी गई है।

इनमें 1,000 पुलिस कांस्टेबल पद शामिल हैं, जो राज्य में कानून-व्यवस्था को मजबूत करेंगे। इसके अलावा वन विभाग में 500 सहायक वन रक्षक पदों को स्वीकृति दी गई है, जिनमें से 50 प्रतिशत पद ‘वन मित्रों’ के लिए आरक्षित होंगे।

इस निर्णय से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय युवाओं को लाभ मिलेगा।

भविष्य की दिशा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह की नीतियों को लगातार लागू किया गया, तो हिमाचल प्रदेश प्राकृतिक खेती का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है। MSP में वृद्धि से किसानों का विश्वास बढ़ेगा और वे अधिक संख्या में इस पद्धति को अपनाएंगे।

सरकार की यह पहल न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यावरण और समाज दोनों के लिए दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित करती है।

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