नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): ग्रामीण अर्थव्यवस्था: देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुस्ती के स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगे हैं। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के रूरल इकोनॉमिक कंडीशंस एंड सेंटिमेंट्स सर्वे (जुलाई 2026) के अनुसार, ग्रामीण परिवारों की आय वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ गई है। सर्वे में केवल 27.7 प्रतिशत परिवारों ने पिछले एक वर्ष में आय बढ़ने की बात कही, जबकि 72.4 प्रतिशत परिवारों की आय या तो स्थिर रही या घट गई। इसके साथ ही बचत में गिरावट और अनौपचारिक कर्ज पर बढ़ती निर्भरता ने ग्रामीण वित्तीय स्थिति को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।
यह द्विमासिक सर्वे देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 20,000 ग्रामीण परिवारों पर आधारित है।
आधे से अधिक परिवारों की आय में कोई बढ़ोतरी नहीं
सर्वे के अनुसार, 52.6 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने बताया कि पिछले एक वर्ष में उनकी आय में कोई बदलाव नहीं आया। यह सर्वे शुरू होने के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। वहीं 19.8 प्रतिशत परिवारों ने आय में गिरावट दर्ज की, जबकि केवल 27.7 प्रतिशत परिवारों ने आय बढ़ने की जानकारी दी। यह सितंबर 2024 में सर्वे शुरू होने के बाद सबसे कम स्तर है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर विशेषज्ञों का कहना है कि नवंबर 2025 के बाद से लगातार ऐसे परिवारों की संख्या घट रही है जिनकी आय में वृद्धि हुई है। यह संकेत देता है कि ग्रामीण आय में सुधार की गति कमजोर पड़ रही है।
खर्च बढ़ रहा, लेकिन बचत घट रही
ग्रामीण परिवारों के उपभोग खर्च में भी नरमी के संकेत मिले हैं। 74.1 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि उनका उपभोग खर्च बढ़ा है, जबकि मई 2026 में यह आंकड़ा 77.2 प्रतिशत और जुलाई 2025 में 76.6 प्रतिशत था। सर्वे शुरू होने के बाद यह केवल दूसरी बार है जब यह अनुपात 75 प्रतिशत से नीचे आया है।
इसके बावजूद ग्रामीण परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च कर रहे हैं।
| आय का उपयोग | औसत हिस्सा |
|---|---|
| उपभोग खर्च | 66.5% |
| कर्ज चुकाने में | 12.5% |
नाबार्ड के अनुसार, वित्तीय बचत बढ़ने की बात कहने वाले परिवारों का अनुपात घटकर 17.8 प्रतिशत रह गया, जो सर्वे का अब तक का सबसे निचला स्तर है। इससे संकेत मिलता है कि ग्रामीण परिवारों की बचत क्षमता लगातार कमजोर हो रही है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था: बढ़ रही है साहूकारों और रिश्तेदारों पर निर्भरता
सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज के स्वरूप में आ रहे बदलाव को लेकर है। जुलाई 2026 में 51 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि वे केवल औपचारिक संस्थानों—जैसे बैंक, एनबीएफसी और माइक्रोफाइनेंस संस्थानों—से कर्ज लेते हैं। नवंबर 2025 में यह अनुपात 58.3 प्रतिशत था।

इसके विपरीत, केवल अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर परिवारों की हिस्सेदारी बढ़कर 23.6 प्रतिशत हो गई है। इनमें—
- 16.2 प्रतिशत परिवार केवल मित्रों और रिश्तेदारों से उधार लेते हैं।
- 6 प्रतिशत परिवार केवल साहूकारों से कर्ज लेते हैं।
- 1.4 प्रतिशत परिवार दोनों अनौपचारिक स्रोतों का उपयोग करते हैं।
इसके अलावा 25.3 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जो औपचारिक और अनौपचारिक दोनों स्रोतों से ऋण लेते हैं।
सर्वे के अनुसार, अनौपचारिक कर्ज पर औसत ब्याज दर 17.77 प्रतिशत है। हालांकि, लगभग 20 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने ब्याज-मुक्त ऋण लेने की जानकारी दी, जो मुख्यतः रिश्तेदारों या मित्रों से प्राप्त उधार था।
महंगाई और मानसून की चिंता
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव ऐसे समय में बढ़ रहा है जब खुदरा महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी हुई है और मानसून को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। जून में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले 17 महीनों का उच्चतम स्तर है। वहीं, कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा और अल-नीनो की आशंकाओं ने कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खरीफ फसलों का प्रदर्शन अपेक्षा से कमजोर रहता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में डिमांड और इनकम दोनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था: भविष्य को लेकर भी घटी उम्मीदें
नाबार्ड के सर्वे में ग्रामीण परिवारों का भविष्य को लेकर भरोसा भी कमजोर पड़ा है। अगले तीन महीनों में आय और रोजगार बेहतर होने की उम्मीद जताने वाले परिवारों का अनुपात सर्वे शुरू होने के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। वहीं अगले एक वर्ष में आय बढ़ने की उम्मीद रखने वाले परिवारों की हिस्सेदारी घटकर 66.8 प्रतिशत रह गई है, जो अब तक का सबसे कम स्तर है।
ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है असर
ग्रामीण आय, बचत और उपभोग भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख संकेतक माने जाते हैं। आय वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ने, बचत घटने और महंगे अनौपचारिक कर्ज पर निर्भरता बढ़ने से ग्रामीण मांग कमजोर होने का जोखिम बढ़ सकता है। इसका असर कृषि निवेश, उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री और समग्र आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में अच्छा मानसून, कृषि आय में सुधार, ग्रामीण रोजगार और सस्ती संस्थागत ऋण सुविधा ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकती है। फिलहाल नाबार्ड का सर्वे इस ओर संकेत करता है कि ग्रामीण भारत आर्थिक मोर्चे पर पहले की तुलना में अधिक दबाव महसूस कर रहा है।
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