नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का विजन 2031: खाद्य प्रसंस्करण उद्योग देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है। 17वें ‘फूडवर्ल्ड इंडिया 2026’ सम्मेलन में खाद्य प्रसंस्करण सचिव अविनाश जोशी ने देश के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन पर विशेष ध्यान दे रही है।
प्रमुख सरकारी लक्ष्य और रणनीतियां
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प्रोसेसिंग स्तर: वर्ष 2023 के 17% के स्तर से इसे 2031 तक 25% तक पहुंचाना।
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नई नीतिगत पहल: सरकार ‘राष्ट्रीय प्रोसेसिंग मिशन’ या ‘PLI 2.0’ जैसी योजनाओं पर विचार कर रही है ताकि निवेश को और गति दी जा सके।
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रोजगार सृजन: खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र वर्तमान में सभी PLI योजनाओं के तहत कुल रोजगार सृजन में लगभग 48% हिस्सेदारी रखता है, जो इसकी अपार क्षमता को दर्शाता है।
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ब्रांडिंग: ‘भारत’ ब्रांड के तहत भारतीय व्यंजनों और पेय पदार्थों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की योजना है।
बाजार का भविष्य और आर्थिक संभावनाएँ
डेलॉयट इंडिया और फिक्की की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय खाद्य उद्योग मूल्य-आधारित विकास के अगले चरण में है।
| विशेष विवरण | वर्ष 2030 तक का अनुमान |
| कुल बाजार आकार | लगभग 600 अरब डॉलर |
| ऑनलाइन बिक्री (महानगरों में) | खुदरा बिक्री का 25-30% |
| नए उत्पादों का लॉन्च | 70% ई-कॉमर्स/क्विक कॉमर्स के जरिए |

तकनीकी क्रांति और नवाचार
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि भारत में खाद्य प्रसंस्करण अब पारंपरिक तरीकों से हटकर अत्याधुनिक तकनीकों की ओर बढ़ रहा है:
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जेनरेटिव एआई (Generative AI): भारत के 84% सीईओ एआई में निवेश कर रहे हैं, जिससे नए उत्पादों के विकास का समय (Time-to-market) 30 से 60% तक कम हो गया है।
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डिजिटल परिवर्तन: एआई और एडवांस एनालिटिक्स का उपयोग मांग के पूर्वानुमान और मैन्युफैक्चरिंग में किया जा रहा है।
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एमएसएमई (MSME) की भूमिका: चूंकि 90% से अधिक इकाइयां एमएसएमई हैं, इसलिए आपूर्ति शृंखला की दक्षता को सुधारना वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए अनिवार्य है।
निर्यात को नई दिशा
भारत का खाद्य निर्यात 50 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है, लेकिन इसमें प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी अभी भी मात्र 20% है। इस अंतर को कम करने के लिए सरकार और उद्योग मिलकर इन्फ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमेशन, आईओटी और नियामकीय सुधारों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। पोषण और फंक्शनल फूड की बढ़ती मांग को देखते हुए, भारत के पास अपनी निर्यात टोकरी को अधिक ‘मूल्य-संवर्धित’ बनाने का सुनहरा अवसर है।
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