अहमदाबाद (कृषि भूमि ब्यूरो): खाद्य प्रसंस्करण– दक्षिण एशिया की कृषि अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां केवल कृषि उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विश्व बैंक समूह का मानना है कि यदि क्षेत्र कृषि उत्पादन से आगे बढ़कर खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, लॉजिस्टिक्स और मूल्य संवर्धन पर ध्यान केंद्रित करता है, तो इससे लाखों रोजगार सृजित हो सकते हैं, अरबों डॉलर का निवेश आकर्षित किया जा सकता है और आर्थिक विकास को नई गति मिल सकती है।
यह विचार गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित क्षेत्रीय उच्च स्तरीय नीति संवाद “Unlocking Value: Advancing Food Processing for Employment Generation and Sustainable Growth in South Asia” के दौरान सामने आया। दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (MoFPI) और विश्व बैंक समूह समर्थित SAPLING पहल के सहयोग से किया गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान ने किया। उन्होंने कहा कि भारत तेजी से वैश्विक खाद्य प्रसंस्करण केंद्र के रूप में उभर रहा है और मूल्य संवर्धन, तकनीकी नवाचार तथा क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से दक्षिण एशिया की खाद्य अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है।
कृषि और समृद्धि के बीच मजबूत सेतु
सम्मेलन में लगभग 200 नीति निर्माता, उद्योग प्रतिनिधि, निवेशक, शोधकर्ता, स्टार्टअप और विकास साझेदार शामिल हुए। अपने संबोधन में चिराग पासवान ने कहा कि खाद्य प्रसंस्करण कृषि और आर्थिक समृद्धि के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने और खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने की बड़ी क्षमता रखता है।
विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण एशिया का कृषि क्षेत्र प्रतिवर्ष 700 अरब डॉलर से अधिक का है और यह क्षेत्र के लगभग 43 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार देता है। इसके बावजूद क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि का योगदान लगभग 16 प्रतिशत ही है। यह असंतुलन कृषि मूल्य श्रृंखला में मौजूद चुनौतियों और अवसरों दोनों को दर्शाता है।
हर साल नष्ट हो रही है बड़ी मात्रा में खाद्य सामग्री
विश्व बैंक समूह ने चिंता जताई कि दक्षिण एशिया में उत्पादित 30 प्रतिशत से अधिक खाद्य सामग्री हर वर्ष खराब हो जाती है। यह मात्रा लगभग 30 करोड़ लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त मानी जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कोल्ड चेन, वेयरहाउसिंग, परिवहन नेटवर्क और आधुनिक लॉजिस्टिक्स के अभाव में बड़ी मात्रा में कृषि उत्पाद बाजार तक पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं। यदि इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया जाए तो खाद्य अपव्यय कम करने के साथ-साथ किसानों की आय और उपभोक्ताओं तक गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की पहुंच भी बेहतर हो सकती है।
भारत का अनुभव बना उदाहरण
कार्यक्रम में भारत को कृषि मूल्य श्रृंखला परिवर्तन के सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया। देश का खाद्यान्न उत्पादन 1950-51 में 5.1 करोड़ टन से बढ़कर वर्तमान में 33 करोड़ टन से अधिक हो चुका है।
इसी तरह पिछले एक दशक में भारत का प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात लगभग 4.9 अरब डॉलर से बढ़कर 10 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। वर्तमान में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देश के विनिर्माण मूल्य संवर्धन में लगभग 9 प्रतिशत और कुल निर्यात में करीब 13 प्रतिशत का योगदान देता है।
प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) तथा उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना जैसी सरकारी पहलों ने इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, निवेश आकर्षित करने और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
निवेश और रोजगार की अपार संभावनाएं
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत और दक्षिण एशिया में कृषि उपज का बड़ा हिस्सा अब भी बिना प्रसंस्करण के सीधे बाजार तक पहुंचता है। इसका अर्थ है कि मूल्य संवर्धन और रोजगार सृजन की व्यापक संभावनाएं अभी भी मौजूद हैं।
तेजी से बढ़ता शहरीकरण, विस्तार करता मध्यम वर्ग, बढ़ती आय और सुरक्षित एवं उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पादों की मांग इस क्षेत्र में निवेश और नवाचार के नए अवसर पैदा कर रही है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था के बीच एक मजबूत आर्थिक पुल के रूप में उभर सकता है।

AgriConnect और SAPLING पर विश्व बैंक का फोकस
विश्व बैंक समूह वर्तमान में AgriConnect और SAPLING जैसी पहलों के माध्यम से खाद्य प्रणाली में परिवर्तन को गति देने का प्रयास कर रहा है। AgriConnect का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 30 करोड़ किसानों को बाजारों से जोड़ना है। इसके तहत बुनियादी ढांचे में निवेश, नीतिगत सुधार और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
SAPLING पहल सरकारों, निवेशकों, विकास संस्थानों और नवाचारकर्ताओं को एक मंच पर लाकर नीतिगत सुधारों और निवेश परियोजनाओं को बढ़ावा देने का कार्य कर रही है। यह पहल भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित कई देशों में सुधार कार्यक्रमों का समर्थन कर रही है।
सम्मेलन में शामिल विशेषज्ञों ने सरकारों, उद्योगों, निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कोल्ड चेन, वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स हब, एग्रो-इंडस्ट्रियल पार्क और खाद्य प्रसंस्करण क्लस्टरों में निवेश बढ़ाने की सिफारिश की।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दक्षिण एशिया कृषि उत्पादन के साथ-साथ खाद्य प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर रणनीतिक रूप से निवेश करता है, तो यह क्षेत्र न केवल खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि करोड़ों लोगों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा करेगा। यही परिवर्तन आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया की आर्थिक वृद्धि का नया इंजन बन सकता है।
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