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Urea Import: भारत के लिए बड़ी राहत, यूरिया की कीमतें आधी हुईं; किसानों और सरकार दोनों को मिलेगा फायदा

Urea Import

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): Urea Import: खरीफ सीजन के बीच भारत के लिए यूरिया आयात के मोर्चे पर एक बड़ी सकारात्मक खबर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है और भाव अब लगभग उस स्तर पर लौट आए हैं, जहां वे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और ईरान से जुड़े आपूर्ति संकट से पहले थे। इस घटनाक्रम से न केवल किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी, बल्कि केंद्र सरकार के खाद सब्सिडी बिल पर भी दबाव कम होने की उम्मीद है।

एनएफएल को मिली बेहद कम कीमत की बोलियां

Urea Import: सरकारी क्षेत्र की कंपनी नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) ने 27 मई को 17 लाख टन यूरिया आयात के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया था। इस टेंडर में कंपनी को 449.30 अमेरिकी डॉलर प्रति टन तक की प्रतिस्पर्धी और अपेक्षाकृत कम कीमत वाली बोलियां प्राप्त हुई हैं।

जानकारों के अनुसार, पूर्वी तट के लिए सबसे कम बोली 444.90 डॉलर प्रति टन और पश्चिमी तट के लिए 449.30 डॉलर प्रति टन रही। यह स्तर हाल के महीनों की तुलना में काफी कम माना जा रहा है।

टेंडर में सप्लायरों ने कुल 6.25 मिलियन टन यूरिया की आपूर्ति की पेशकश की है, जो मांगी गई मात्रा से कई गुना अधिक है। इससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक बाजार में आपूर्ति की स्थिति मजबूत हुई है और विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है।

अप्रैल के मुकाबले लगभग आधी हुई कीमत

यूरिया बाजार में आई गिरावट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 4 अप्रैल को इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) द्वारा जारी 25 लाख टन यूरिया आयात टेंडर में सप्लायरों ने 935 डॉलर से 959 डॉलर प्रति टन तक की कीमतें मांगी थीं।

अब वही कीमत घटकर लगभग 449 डॉलर प्रति टन के आसपास पहुंच गई है। यानी दो महीने के भीतर अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है।

Urea Import: खरीफ सीजन के लिए समय पर पहुंचेगी खेप

टेंडर की शर्तों के अनुसार आयातित यूरिया को 20 जुलाई तक जहाजों पर लोड किया जाना आवश्यक है। इसके बाद अगस्त तक इसकी खेप भारत पहुंच जाएगी, जिससे खरीफ सीजन के अंतिम चरण में किसानों को पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराया जा सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर आयात होने से कृषि गतिविधियों पर किसी प्रकार का दबाव नहीं पड़ेगा और मांग के अनुरूप आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी।

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चीन के निर्यात शुरू होने से बदली तस्वीर

उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, यूरिया की कीमतों में आई तेज गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण चीन का अंतरराष्ट्रीय बाजार में फिर से सक्रिय होना है।

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अनिश्चितताओं के दौरान वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई थी। इसी अवधि में चीन ने मार्च के दौरान यूरिया निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं।

अब चीन के निर्यात दोबारा शुरू होने से वैश्विक बाजार में उपलब्धता बढ़ी है और कीमतों पर दबाव बना है।

वैश्विक मांग में कमी ने भी घटाए दाम

विशेषज्ञ बताते हैं कि ब्राजील, यूरोप, अफ्रीका और कई एशियाई देशों में किसान सब्सिडी के बजाय बाजार मूल्य पर खाद खरीदते हैं। जब यूरिया की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचीं, तब इन क्षेत्रों में मांग में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई।

मांग कमजोर पड़ने के कारण वैश्विक बाजार में अतिरिक्त स्टॉक जमा होने लगा, जिससे सप्लायरों को कीमतें घटानी पड़ीं। इसका सीधा लाभ भारत जैसे बड़े आयातक देशों को मिल रहा है।

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Urea Import: सरकार के सब्सिडी बिल को मिलेगी राहत

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में खाद सब्सिडी के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। हालांकि कुछ महीने पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद और कच्चे माल की कीमतों में आई तेजी के बाद आशंका जताई जा रही थी कि सब्सिडी खर्च 3 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर जा सकता है।

अब यूरिया कीमतों में आई बड़ी गिरावट ने इस जोखिम को काफी हद तक कम कर दिया है। कम आयात लागत (Urea Import) का मतलब है कि सरकार को प्रति टन कम सब्सिडी देनी होगी, जिससे राजकोषीय दबाव घटेगा।

किसानों और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत

Urea Import: यूरिया कीमतों में नरमी भारत के कृषि क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत है। इससे खरीफ फसलों के दौरान खाद की उपलब्धता बेहतर होगी और आपूर्ति संबंधी चिंताओं में कमी आएगी। साथ ही सरकार के सब्सिडी खर्च में संभावित बचत से वित्तीय संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक बाजार में आपूर्ति की स्थिति इसी तरह बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में भी उर्वरक बाजार स्थिर रह सकता है, जिसका लाभ सीधे किसानों और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों को मिलेगा।

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