नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): एनपीके उर्वरक – पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक बाजार में कच्चे माल की कमी का असर अब भारतीय कृषि क्षेत्र पर साफ दिखाई देने लगा है। देश में कॉम्प्लेक्स उर्वरकों यानी एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश) के कई वेरिएंट की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। उर्वरक कंपनियों ने कुछ प्रमुख एनपीके वेरिएंट की कीमतें बढ़ाकर 2250 रुपये से 2450 रुपये प्रति 50 किलो बैग तक कर दी हैं।
उद्योग सूत्रों के अनुसार, यदि सरकार अतिरिक्त सब्सिडी नहीं देती है तो किसानों को आगामी खरीफ सीजन में यही ऊंची कीमत चुकानी पड़ सकती है। इससे खेती की लागत बढ़ने और किसानों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
डीएपी और यूरिया पर नियंत्रण, लेकिन एनपीके महंगा
देश में यूरिया की कीमत सरकार नियंत्रित करती है, इसलिए उसके दाम फिलहाल स्थिर बने हुए हैं। वहीं, डाईअमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की कीमत भी सरकार ने परोक्ष रूप से 1350 रुपये प्रति बैग पर बनाए रखी है। इसके लिए सरकार न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) योजना के तहत अतिरिक्त सब्सिडी दे रही है।
हालांकि, बाकी विनियंत्रित कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के मामले में ऐसी राहत नहीं दी जा रही। बढ़ती लागत के चलते कंपनियां लगातार एनपीके उर्वरकों के दाम बढ़ा रही हैं। स्थिति यह है कि कुछ एनपीके वेरिएंट की कीमतें डीएपी से भी कहीं अधिक हो गई हैं, जबकि उनमें पोषक तत्वों का स्तर डीएपी से कम है।
12:32:16 और 10:26:26 वेरिएंट सबसे महंगे
उर्वरक उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, एक बड़ी उर्वरक कंपनी ने एनपीके के लोकप्रिय वेरिएंट 12:32:16 और 10:26:26 की कीमत 2450 रुपये प्रति बैग तक प्रस्तावित की है। कंपनियों का कहना है कि अमोनिया, सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड जैसे कच्चे माल की कीमतों में भारी वृद्धि के कारण इससे कम कीमत पर बिक्री घाटे का सौदा होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है, जिससे इन रसायनों की उपलब्धता घट गई है और आयात लागत बढ़ गई है।
उत्पादन पर भी पड़ा असर
कच्चे माल की कमी का असर केवल कीमतों तक सीमित नहीं है। कई उर्वरक संयंत्र पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। उद्योग सूत्रों के अनुसार, अमोनिया और सल्फ्यूरिक एसिड की उपलब्धता कम होने के कारण एनपीके और डीएपी उत्पादन प्रभावित हुआ है।
हालांकि, यूरिया उत्पादन अपेक्षाकृत सामान्य बना हुआ है क्योंकि अधिकांश यूरिया संयंत्र पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं।
अलग-अलग राज्यों में अलग कीमतें
देश में सबसे अधिक बिकने वाले एनपीके वेरिएंट 20:20:0:13 की कीमतों में भी बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है।
| कंपनी | राज्य | नई कीमत (रुपये प्रति बैग) |
|---|---|---|
| जीएसएफसी | कई राज्य | 2250 |
| पारादीप फॉस्फेट लिमिटेड | कर्नाटक | 1850 |
| पारादीप फॉस्फेट लिमिटेड | तेलंगाना | 1800 |
| FACT | कर्नाटक/केरल/आंध्र/तेलंगाना | 2100 |
| FACT | तमिलनाडु | 1800 |
| SPIC | तमिलनाडु/आंध्र/तेलंगाना | 1800 |
| MCF | तमिलनाडु | 2100 |
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि 20:20:0:13 वेरिएंट की उत्पादन लागत ही करीब 2400 रुपये प्रति बैग तक पहुंच चुकी है। ऐसे में कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सरकार का फोकस आयात और नियंत्रण पर
उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकार ने हाल ही में 25 लाख टन यूरिया आयात को मंजूरी दी है। इसके तहत पूर्वी तट के लिए 959 डॉलर प्रति टन और पश्चिमी तट के लिए 935 डॉलर प्रति टन की दर तय की गई है।
इसके अलावा, सरकारी और सहकारी कंपनियों के एक कंसोर्टियम ने करीब 13 लाख टन डीएपी आयात का भी टेंडर अंतिम रूप दिया है। इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ और बढ़ने की संभावना है।

बिक्री नियमों में सख्ती
कई राज्यों में उर्वरकों की बिक्री को लेकर प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी है। किसानों को एक आधार कार्ड पर केवल दो या तीन बैग यूरिया या डीएपी दिए जा रहे हैं। इसके लिए जमीन का रिकॉर्ड और बायोमैट्रिक सत्यापन अनिवार्य किया गया है।
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के एक उर्वरक विक्रेता के अनुसार, सीमित बिक्री के कारण किसानों को बार-बार केंद्रों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। वहीं, महंगे एनपीके उर्वरकों की तुलना में किसान डीएपी को प्राथमिकता दे रहे हैं।
खपत घटाने की तैयारी में सरकार
सरकार रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने के लिए नई कार्ययोजना तैयार कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हाल ही में हुई बैठकों में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। माना जा रहा है कि जल्द ही उर्वरक उपयोग को संतुलित करने और वैकल्पिक पोषण प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए नई नीति लाई जा सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ सीजन के दौरान यदि किसानों को समय पर और उचित कीमत पर उर्वरक उपलब्ध नहीं हुए, तो इसका असर सीधे कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
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