नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): डीएपी आयात: खरीफ सीजन की तैयारी के बीच भारत को डाइअमोनियम फॉस्फेट (DAP) और अन्य उर्वरकों के आयात के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। पश्चिमी एशिया में जारी संकट और अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण वैश्विक उर्वरक बाजार में उथल-पुथल मची हुई है। इसी बीच भारतीय कंपनियों ने करीब 15 लाख टन डीएपी आयात के सौदे 920 से 930 डॉलर प्रति टन की दर पर किए हैं, जो कुछ महीने पहले की तुलना में लगभग 30 फीसदी अधिक हैं।
डीएपी आयात: उद्योग सूत्रों के अनुसार फरवरी में अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीएपी की कीमतें 720 से 730 डॉलर प्रति टन के आसपास थीं। लेकिन युद्ध और आपूर्ति संकट के कारण अब यही कीमतें 920 से 1000 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई हैं। इससे सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ और बढ़ना तय माना जा रहा है।
डीएपी आयात: युद्ध और आपूर्ति संकट से बढ़ी कीमतें
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का सीधा असर उर्वरकों और ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। डीएपी उत्पादन के लिए सल्फर और अमोनिया जैसे कच्चे माल की जरूरत होती है, जिनकी उपलब्धता प्रभावित हुई है। दुनिया के बड़े डीएपी निर्यातकों में शामिल मोरक्को और चीन से इस बार आपूर्ति नहीं हो पा रही है।
उद्योग सूत्रों के मुताबिक चीन ने फिलहाल डीएपी निर्यात रोक रखा है, जबकि मोरक्को में सल्फर की कमी के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है। सल्फर से सल्फ्यूरिक एसिड तैयार किया जाता है, जो डीएपी निर्माण की अहम आवश्यकता है।
महंगा डीएपी आयात बढ़ाएगा सब्सिडी का दबाव
भारत सरकार पहले ही 935 और 959 डॉलर प्रति टन की दर से 25 लाख टन यूरिया आयात के सौदे कर चुकी है। युद्ध से पहले जहां यूरिया 435 डॉलर प्रति टन पर आयात किया जा रहा था, वहीं अब कीमतें दोगुने के करीब पहुंच चुकी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरकों के महंगे आयात का सीधा असर सरकार की सब्सिडी पर पड़ेगा। भारत में किसानों को नियंत्रित कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए सरकार भारी सब्सिडी देती है। ऐसे में वैश्विक कीमतें बढ़ने से सरकारी खर्च भी तेजी से बढ़ेगा।
देश में उर्वरकों का मौजूदा भंडार
सरकार के अनुसार देश में वर्तमान में कुल 199.65 लाख टन उर्वरकों का भंडार उपलब्ध है, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है।
| उर्वरक | मौजूदा भंडार (लाख टन) |
|---|---|
| यूरिया | 76.65 |
| डीएपी | 22.52 |
| एनपीके | 60.42 |
| एसएसपी | 26.99 |
| एमओपी | 13.07 |
सरकार ने पूरे खरीफ सीजन के दौरान 390.54 लाख टन उर्वरकों की मांग का अनुमान लगाया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक आपूर्ति संकट लंबा खिंचता है तो आने वाले महीनों में दबाव बढ़ सकता है।
घरेलू उत्पादन में भी आई गिरावट
उर्वरकों के घरेलू उत्पादन पर भी संकट का असर दिखाई दे रहा है। पिछले वर्ष 1 मार्च से 10 मई के बीच देश में कुल 92.01 लाख टन उर्वरकों का उत्पादन हुआ था, जबकि इस वर्ष इसी अवधि में उत्पादन घटकर 76.78 लाख टन रह गया।
| उर्वरक | पिछले वर्ष उत्पादन | इस वर्ष उत्पादन |
|---|---|---|
| यूरिया | 54.98 लाख टन | 46.28 लाख टन |
| डीएपी | 5.56 लाख टन | 6.20 लाख टन |
| एनपीके | 22.03 लाख टन | 15.57 लाख टन |
| एसएसपी | 9.44 लाख टन | 8.73 लाख टन |
विशेषज्ञों का कहना है कि एलएनजी की कमी घरेलू उत्पादन में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। भारत सबसे अधिक एलएनजी आयात कतर से करता रहा है, लेकिन युद्ध की स्थिति के कारण खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति प्रभावित हुई है।
किसानों तक पहुंचने लगा असर
उर्वरक संकट का असर अब जमीनी स्तर पर भी दिखाई देने लगा है। कई राज्यों से किसानों को सीमित मात्रा में यूरिया मिलने की खबरें सामने आ रही हैं। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के किसान रामकुमार के अनुसार खाद केंद्रों पर केवल दो बोरी यूरिया दी जा रही है, जो फसलों की जरूरत के हिसाब से पर्याप्त नहीं है।
इस समय गन्ने की फसल में यूरिया की मांग अधिक रहती है और अगले कुछ हफ्तों में धान की बुवाई शुरू होने के साथ मांग और बढ़ेगी। ऐसे में यदि आपूर्ति बाधित रही तो किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
प्राकृतिक खेती पर जोर, लेकिन चुनौती बरकरार
बढ़ती सब्सिडी और महंगे आयात के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने और प्राकृतिक खेती को अपनाने की अपील कर चुके हैं। हालांकि कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े स्तर पर प्राकृतिक खेती अपनाने में समय लगेगा और फिलहाल देश की खाद्य सुरक्षा काफी हद तक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर है।
उधर, सरकार सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री के लिए एक राष्ट्रीय फ्रेमवर्क तैयार करने पर काम कर रही है। इसके तहत किसानों को उर्वरकों की बिक्री की मात्रा और प्रक्रिया तय की जाएगी। हालांकि अभी तक इस फ्रेमवर्क की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
महंगे डीएपी आयात का असर
खरीफ सीजन से पहले महंगे डीएपी आयात और यूरिया आयात ने सरकार और किसानों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। वैश्विक संकट, ऊर्जा आपूर्ति में बाधा और उत्पादन लागत बढ़ने के कारण आने वाले महीनों में उर्वरक बाजार पर दबाव बना रह सकता है। यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो इसका असर खेती की लागत, सरकारी सब्सिडी और खाद्य महंगाई पर भी दिखाई दे सकता है।
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