नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 – केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 को लेकर देशभर में किसान संगठनों और खांडसारी उद्योग से जुड़े लोगों के बीच विरोध तेज होने लगा है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने 20 अप्रैल को इस मसौदे को सार्वजनिक करते हुए 20 मई तक सुझाव मांगे हैं। यह नया आदेश छह दशक पुराने गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 की जगह लेने वाला है।
हालांकि, गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 का मसौदा जारी होते ही इसके कई प्रावधान विवादों में आ गए हैं। किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार किसानों से बिना व्यापक चर्चा किए ऐसे बदलाव लागू करना चाहती है, जिनसे निजी चीनी मिलों को लाभ मिलेगा और किसानों की सौदेबाजी की ताकत कमजोर होगी।
किसान संगठनों ने बताया किसान-विरोधी
अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) और जय किसान आंदोलन समेत कई किसान संगठनों ने प्रस्तावित गन्ना नियंत्रण आदेश का विरोध किया है। उनका कहना है कि मसौदे में ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं जो गन्ना किसानों को निजी मिलों पर अधिक निर्भर बना देंगे।
मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में आयोजित एक गोष्ठी में किसान नेताओं, कृषि विशेषज्ञों और खांडसारी उद्योग के प्रतिनिधियों ने नए आदेश की खामियों पर चर्चा की। कार्यक्रम में जय किसान आंदोलन के संस्थापक योगेंद्र यादव ने कहा कि सुधार के नाम पर किसानों के हितों को कमजोर किया जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने मसौदे की प्रति किसान संगठनों को नहीं भेजी, जबकि चीनी उद्योग से जुड़े संगठनों को इसकी जानकारी पहले ही दे दी गई। उनका कहना था कि गन्ना किसानों के जीवन और आय पर असर डालने वाले इतने महत्वपूर्ण आदेश पर किसानों से राय लेना जरूरी था।

चीनी मिलों के बीच दूरी बढ़ाने पर विवाद
नए मसौदे में चीनी मिलों के बीच न्यूनतम दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव है। किसान संगठनों का कहना है कि इससे नई मिलों की स्थापना मुश्किल हो जाएगी और मौजूदा मिलों का एकाधिकार बढ़ेगा।
तराई किसान संगठन के नेता तेजेंद्र सिंह विर्क ने कहा कि उत्तर प्रदेश में नई चीनी मिलों की स्थापना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली थी। लेकिन दूरी बढ़ाने का फैसला किसानों के हित में नहीं बल्कि बड़े उद्योग समूहों के हित में दिखाई देता है।
गन्ना नियंत्रण आदेश: खांडसारी और गुड़ उद्योग भी चिंतित
प्रस्तावित आदेश को लेकर गुड़ और खांडसारी उद्योग से जुड़े कारोबारी भी चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि नए नियमों के तहत खांडसारी इकाइयों को भी चीनी मिलों की तरह सख्त नियमन के दायरे में लाया जा रहा है।
गुड़ और खांडसारी उद्योग से जुड़े यशपाल मलिक ने कहा कि यदि छोटे ग्रामीण उद्योगों पर लाइसेंस और नियामकीय दबाव बढ़ा तो इससे हजारों स्थानीय इकाइयां प्रभावित होंगी। उनका मानना है कि किसानों को अक्सर खांडसारी और गुड़ उद्योग से बेहतर दाम मिलते हैं, लेकिन नए आदेश के बाद यह विकल्प सीमित हो सकता है।
एफआरपी भुगतान पर भी उठे सवाल
मसौदे में फेयर एंड रेम्यूनरेटिव प्राइस (FRP) के भुगतान को अनिवार्य बनाए जाने का भी प्रावधान है। किसान संगठनों का कहना है कि इससे खांडसारी इकाइयां किसानों को एफआरपी से अधिक कीमत नहीं दे पाएंगी। उनका आरोप है कि इससे किसानों की प्रतिस्पर्धी बाजार तक पहुंच सीमित हो जाएगी।
गन्ना नियंत्रण आदेश: प्रस्तावित बदलाव और विवाद
| प्रस्तावित प्रावधान | किसान संगठनों की आपत्ति |
|---|---|
| मिलों के बीच दूरी 15 से 25 किमी | नई मिलों की स्थापना प्रभावित होगी |
| खांडसारी इकाइयों पर सख्त नियम | ग्रामीण उद्योग कमजोर होंगे |
| एफआरपी भुगतान अनिवार्य | किसानों को अधिक दाम मिलने की संभावना घटेगी |
| मसौदा केवल अंग्रेजी में जारी | किसानों की भागीदारी सीमित हुई |
भाषा और पारदर्शिता पर भी सवाल
किसान संगठनों ने इस बात पर भी नाराजगी जताई है कि गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 का मसौदा केवल अंग्रेजी भाषा में जारी किया गया। यहां तक कि मंत्रालय की हिंदी वेबसाइट पर भी अंग्रेजी प्रति ही अपलोड की गई। संगठनों का कहना है कि इससे बड़ी संख्या में हिंदीभाषी किसानों के लिए मसौदे को समझना मुश्किल हो गया।
जय किसान आंदोलन से जुड़े मनीष भारती ने कहा कि संगठन देशभर में किसानों के बीच जाकर नए आदेश की जानकारी देगा और इसके विरोध में अभियान चलाया जाएगा।
केंद्र सरकार फिलहाल 20 मई तक सुझाव आमंत्रित कर रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में गन्ना किसानों, खांडसारी उद्योग और सरकार के बीच इस मसौदे को लेकर बहस और तेज होने की संभावना है।
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