नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): Sugarcane Harvesting: देश के चीनी उद्योग और गन्ना किसानों के सामने गन्ना कटाई की बढ़ती लागत और श्रमिकों की कमी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। भारत के दो प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश इस समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन दोनों राज्यों की रणनीतियों में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र जहां तेजी से गन्ना कटाई के मशीनीकरण की ओर बढ़ चुका है, वहीं उत्तर प्रदेश अब भी परंपरागत श्रमिक व्यवस्था पर निर्भर बना हुआ है।
महाराष्ट्र के लातूर जिले की विकासरत्न विलासराव देशमुख मांजरा एसएसएसके लिमिटेड इस बदलाव का बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है। चालू पेराई सत्र 2025-26 में इस चीनी मिल ने लगभग 100 प्रतिशत गन्ना कटाई शुगरकेन हार्वेस्टर मशीनों से की है। यह उपलब्धि देश में गन्ना कटाई के क्षेत्र में मशीनीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
Sugarcane Harvesting: महाराष्ट्र में बढ़ा मशीनों का उपयोग
चीनी उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, देश में इस समय लगभग 3,218 शुगरकेन हार्वेस्टर उपलब्ध हैं। इनमें से करीब 2,200 मशीनें अकेले महाराष्ट्र में उपयोग हो रही हैं। कर्नाटक में लगभग 660 हार्वेस्टर सक्रिय हैं, जबकि तमिलनाडु, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में भी सीमित स्तर पर इनका उपयोग बढ़ा है।
इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में शुगरकेन हार्वेस्टर की संख्या महज पांच बताई जाती है। राज्य में इनके उपयोग को लेकर भी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह अंतर दोनों राज्यों की गन्ना प्रबंधन व्यवस्था को भी दर्शाता है।
जिम्मेदारी का अंतर बना बड़ा कारण
महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ना कटाई और ढुलाई की जिम्मेदारी चीनी मिलों की होती है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह जिम्मेदारी किसानों पर होती है। यही वजह है कि महाराष्ट्र की मिलों ने लागत और श्रमिक संकट से निपटने के लिए मशीनों का सहारा लेना शुरू किया।
महाराष्ट्र में लंबे समय से गन्ना कटाई बाहरी श्रमिकों, खासकर आदिवासी क्षेत्रों से आने वाले मजदूरों द्वारा की जाती रही है। ये श्रमिक ठेकेदारों के जरिए चीनी मिलों से जुड़े होते हैं। इस व्यवस्था में श्रमिकों के शोषण, बढ़ती मजदूरी लागत और बिचौलियों पर निर्भरता जैसी समस्याएं लगातार बढ़ती गईं।
इन्हीं चुनौतियों ने महाराष्ट्र की चीनी मिलों को मशीनीकरण अपनाने के लिए प्रेरित किया।
मांजरा मिल बना मॉडल
Sugarcane Harvesting: लातूर स्थित मांजरा चीनी मिल ने गन्ना कटाई में मशीनों के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ाया है। वर्ष 2021-22 में जहां मशीनों से केवल 38.38 प्रतिशत कटाई होती थी, वहीं 2025-26 में यह आंकड़ा 99.74 प्रतिशत तक पहुंच गया।
मिल के प्रबंध निदेशक पंडित साहेबराव देसाई के अनुसार, श्रमिकों की कमी और बढ़ती गर्मी ने मशीनों की जरूरत को और बढ़ा दिया। मार्च के बाद तापमान बढ़ने से श्रमिकों के लिए खेतों में काम करना मुश्किल हो जाता है, जिससे कटाई प्रभावित होती है और किसानों का गन्ना समय पर मिल तक नहीं पहुंच पाता।
उन्होंने बताया कि कई बार श्रमिक अग्रिम भुगतान लेने के बाद बीच सीजन में काम छोड़ देते हैं, जिससे मिलों की पेराई व्यवस्था प्रभावित होती है। ऐसे में हार्वेस्टर मशीनें अधिक भरोसेमंद विकल्प साबित हुई हैं।
करोड़ों की मशीनें, लेकिन फायदे बड़े
Sugarcane Harvesting: एक शुगरकेन हार्वेस्टर मशीन की कीमत करीब एक से सवा करोड़ रुपये तक होती है। इसके बावजूद मांजरा मिल ने जोखिम उठाते हुए मशीनीकरण को बढ़ावा दिया। वर्ष 2022-23 में लातूर जिला केंद्रीय बैंक की गारंटी पर 31 हार्वेस्टर किसानों को उपलब्ध कराए गए।
आज मांजरा मिल के पास अपनी 25 मशीनें हैं, जबकि 54 मशीनें मिल की गारंटी पर संचालित हो रही हैं। मशीन संचालक मिलों के साथ अनुबंध के तहत गन्ना कटाई का कार्य करते हैं। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं।
मशीन से कटाई के फायदे
विशेषज्ञों के अनुसार, मशीनों से गन्ना कटाई करने से श्रम लागत में कमी आती है और समय की बचत होती है। कटाई के बाद 12 से 15 घंटे के भीतर गन्ने की पेराई होने से शुगर रिकवरी बेहतर होती है।
इसके अलावा, मशीनें गन्ने को जड़ से काटती हैं, जिससे अधिक सुक्रोज युक्त हिस्सा मिलों तक पहुंचता है। इससे उत्पादन और रैटून फसल दोनों को लाभ मिलता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि मशीनीकरण से उत्पादकता में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है।
हालांकि, मशीन संचालन के लिए प्रशिक्षित ऑपरेटरों की जरूरत होती है। एक ऑपरेटर का मासिक वेतन लगभग 55,000 रुपये तक पहुंचता है। इसके लिए चीनी मिलें और मशीन निर्माता कंपनियां प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चला रही हैं।
निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका
गन्ना कटाई (Sugarcane Harvesting) में मशीनीकरण को बढ़ावा देने में निजी कंपनियां भी अहम भूमिका निभा रही हैं। राजकोट की तीरथ एग्रो टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विकसित ‘शक्तिमान तेजस अल्ट्रा हार्वेस्टर’ तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। कंपनी का दावा है कि यह मशीन भारतीय परिस्थितियों और छोटे खेतों को ध्यान में रखकर विकसित की गई है।

Sugarcane Harvesting: उत्तर प्रदेश क्यों पिछड़ा?
उत्तर प्रदेश में गन्ना कटाई का पूरा खर्च किसानों को उठाना पड़ता है। यहां कटाई पर किसानों को प्रति क्विंटल 55 से 60 रुपये तक खर्च करना पड़ता है। राज्य में लगभग 45 लाख गन्ना किसान हैं, जिनमें अधिकतर छोटे और सीमांत किसान हैं।
छोटी जोत और बिखरे खेत बड़े हार्वेस्टर के उपयोग में बड़ी बाधा हैं। इसके अलावा, यूपी की पर्ची प्रणाली के कारण किसानों को निर्धारित समय और मात्रा में गन्ना मिलों तक पहुंचाना होता है, जिससे मशीनों का समन्वित उपयोग कठिन हो जाता है।
चीनी मिल अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा हार्वेस्टर गन्ने को छोटे टुकड़ों में काटते हैं, जिससे यदि पेराई में देरी हो जाए तो शुगर रिकवरी प्रभावित हो सकती है। इसलिए उत्तर प्रदेश के लिए छोटे और पूरे गन्ने की कटाई करने वाले हार्वेस्टर विकसित करने की जरूरत है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में मशीनीकरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार, चीनी मिलों और निजी कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। इसके लिए छोटे किसानों के अनुकूल हार्वेस्टर, वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक तकनीकी समाधान जरूरी होंगे।
यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में श्रमिक संकट और बढ़ती लागत उत्तर प्रदेश के चीनी उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
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