नई दिल्ली ( कृषि भूमि ब्यूरो): भारत के कृषि क्षेत्र के लिए वित्त वर्ष 2026-27 चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की बेहद कमजोर शुरुआत और अल नीनो के बढ़ते जोखिम के बीच रेटिंग एजेंसी ICRA ने कृषि क्षेत्र, वानिकी एवं मत्स्य क्षेत्र की सकल मूल्य वर्धित यानी GVA वृद्धि दर वित्त वर्ष 2026-27 में 1.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। पिछले वित्त वर्ष में इस क्षेत्र की वृद्धि 3 प्रतिशत रही थी।
ICRA की ताजा थीमैटिक रिपोर्ट के मुताबिक जून 2026 में देशभर में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश दीर्घकालिक औसत यानी LPA की केवल 60 प्रतिशत रही। इसका मतलब है कि जून में सामान्य से 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। कमजोर मानसून का सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई और जलाशयों के जलस्तर पर दिखाई देने लगा है।
एजेंसी ने चेतावनी दी है कि जुलाई और अगस्त में बारिश का प्रदर्शन कमजोर रहता है और अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है तो वित्त वर्ष 2027 के लिए कृषि क्षेत्र, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र की 1.4 प्रतिशत GVA वृद्धि के मौजूदा अनुमान में और कटौती की जा सकती है।
कृषि क्षेत्र वृद्धि दर: खरीफ बुवाई में करीब 23 प्रतिशत की गिरावट
मानसून की धीमी शुरुआत के कारण खरीफ फसलों की बुवाई पिछड़ गई है। 25 जून तक खरीफ फसलों का कुल बुवाई क्षेत्र सालाना आधार पर 22.7 प्रतिशत घटकर 1.83 करोड़ हेक्टेयर रह गया, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 2.36 करोड़ हेक्टेयर था।
फसलवार आंकड़ों में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। तिलहन का रकबा 53.3 प्रतिशत, कपास का 34.6 प्रतिशत, दलहन का 30.5 प्रतिशत, धान का 25.2 प्रतिशत और मोटे अनाज का रकबा 11.7 प्रतिशत घटा है। प्रमुख खरीफ फसलों में केवल गन्ने के क्षेत्रफल में 1.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
गन्ने की खेती में सिंचाई की बेहतर उपलब्धता और अपेक्षाकृत पहले बुवाई पूरी होने के कारण मानसून की शुरुआती कमजोरी का असर सीमित रहा है।
जुलाई की बारिश क्यों है सबसे महत्वपूर्ण?
ICRA के अनुसार जुलाई का महीना कृषि अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होगा। देश को दक्षिण-पश्चिम मानसून की कुल मौसमी वर्षा का लगभग 32 प्रतिशत हिस्सा जुलाई में मिलता है। इसके अलावा कुल खरीफ बुवाई का करीब 55 प्रतिशत हिस्सा भी इसी महीने पूरा होता है।
दलहन की लगभग 65 प्रतिशत, तिलहन की 66 प्रतिशत और मोटे अनाज की 62 प्रतिशत खरीफ बुवाई जुलाई में होती है। ऐसे में जुलाई की बारिश में कमी खरीफ उत्पादन, किसानों की आय, ग्रामीण मांग और खाद्य कीमतों पर व्यापक असर डाल सकती है।
चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि मौसम विभाग ने जुलाई में सामान्य से कम बारिश का पूर्वानुमान दिया है। जून की भारी वर्षा कमी के बाद जुलाई का प्रदर्शन अब खरीफ सीजन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

जलाशयों का स्तर घटा, रबी फसलों पर भी जोखिम
कमजोर मानसून का असर केवल खरीफ सीजन तक सीमित नहीं रह सकता। जून के अंत तक देश के प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल जीवित क्षमता के 26 प्रतिशत पर आ गया, जबकि एक साल पहले इसी समय यह 36 प्रतिशत था।
यदि जुलाई और अगस्त में पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो जलाशयों का पुनर्भरण प्रभावित होगा। इससे आगामी रबी सीजन में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम हो सकती है। खासकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में कृषि क्षेत्र पर इसका प्रभाव अधिक पड़ने का जोखिम है।
राजस्थान-महाराष्ट्र समेत इन राज्यों पर ज्यादा खतरा
कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर FY27: ICRA के विश्लेषण के अनुसार मानसून कोर जोन के राज्य कमजोर बारिश और अल नीनो के प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की मानसून पर निर्भरता अधिक है और यहां सिंचाई कवरेज 55 प्रतिशत से कम है।
ये राज्य मिलकर देश के कुल खरीफ कृषि क्षेत्र का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। इसके अलावा देश के खरीफ दलहन उत्पादन का करीब 72 प्रतिशत, मोटे अनाज का 67 प्रतिशत और तिलहन उत्पादन का 64 प्रतिशत इन्हीं मानसून कोर जोन वाले राज्यों से आता है।
मध्य प्रदेश इस क्षेत्र में एक प्रमुख अपवाद है, जहां सिंचाई कवरेज करीब 82 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। माइक्रो इरिगेशन और पाइप आधारित सिंचाई नेटवर्क के विस्तार से राज्य की बारिश पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई है।
गैर-फसल क्षेत्र से मिल सकती है कुछ राहत
हालांकि कृषि अर्थव्यवस्था के लिए पूरी तस्वीर नकारात्मक नहीं है। पशुपालन, वानिकी और मत्स्य पालन जैसे गैर-फसल क्षेत्रों की कृषि GVA में हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 46 प्रतिशत हो चुकी है, जो 2012 में करीब 35 प्रतिशत थी।
पिछले अल नीनो प्रभावित वर्षों के दौरान फसल क्षेत्र की GVA में गिरावट के बावजूद गैर-फसल क्षेत्रों ने अपेक्षाकृत मजबूत वृद्धि दर्ज की थी। ICRA के मुताबिक यह बदलाव कमजोर फसल उत्पादन के दौरान समग्र कृषि GVA पर पड़ने वाले असर को कुछ हद तक सीमित कर सकता है।
फिलहाल कृषि क्षेत्र की नजर जुलाई और अगस्त की बारिश पर टिकी है। यदि मानसून में सुधार होता है तो खरीफ बुवाई की कमी का कुछ हिस्सा पूरा किया जा सकता है। लेकिन बारिश सामान्य से कम बनी रहती है तो इसका असर फसल उत्पादन, ग्रामीण आय, खाद्य बाजार और समग्र कृषि विकास दर पर दिखाई दे सकता है।
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