नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): दलहन की बुवाई – देश में मानसून की धीमी शुरुआत और सामान्य से कम बारिश का असर अब खरीफ फसलों की बुवाई पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, दलहन फसलों की बुवाई में पिछले वर्ष की तुलना में 43 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। विशेष रूप से तुअर (अरहर) और मूंग की खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे किसानों और कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है।
कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण किसान बुवाई शुरू करने या आगे बढ़ाने का इंतजार कर रहे हैं। यदि आने वाले दिनों में मानसून सक्रिय नहीं हुआ तो इसका असर दाल उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ सकता है।
तुअर की बुवाई में 57 फीसदी की गिरावट
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 12 जून तक देशभर में तुअर की बुवाई केवल 0.09 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 57 प्रतिशत कम है।
इसी प्रकार उड़द की बुवाई 0.27 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले साल इसी समय तक 0.35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी बुवाई हो चुकी थी। यानी उड़द की खेती में लगभग 22 प्रतिशत की कमी आई है।
सबसे अधिक असर मूंग की फसल पर दिखाई दिया है। इस वर्ष 12 जून तक मूंग की बुवाई 0.69 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 1.54 लाख हेक्टेयर था। इस प्रकार मूंग की बुवाई में 55 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
प्रमुख दलहन फसलों की बुवाई की स्थिति
| फसल | 2026 (लाख हेक्टेयर) | 2025 (लाख हेक्टेयर) | बदलाव |
|---|---|---|---|
| तुअर (अरहर) | 0.09 | 0.21* | -57% |
| उड़द | 0.27 | 0.35 | -22% |
| मूंग | 0.69 | 1.54 | -55% |
*अनुमानित आधार पर प्रतिशत गणना।
बारिश का इंतजार कर रहे किसान
कर्नाटक प्रदेश रेड ग्राम ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बसवराज इंगिन के अनुसार, उत्तर-पूर्वी कर्नाटक के प्रमुख तुअर उत्पादक क्षेत्रों में अभी तक पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। किसानों के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि मानसून की प्रगति आगे भी धीमी रही तो बुवाई का समय प्रभावित हो सकता है।
उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र के लातूर और सोलापुर जिलों के अलावा तेलंगाना के कई हिस्सों में भी स्थिति लगभग समान है। ये क्षेत्र देश में तुअर उत्पादन के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं।
शुरुआती बुवाई वाली फसलें भी जोखिम में
कुछ क्षेत्रों में शुरुआती बारिश के बाद किसानों ने मूंग की बुवाई कर दी थी, लेकिन अब उन फसलों को बचाने के लिए नई बारिश की आवश्यकता है।
कर्नाटक के गडग जिले के कारोबारी सुजय हुबली के अनुसार, गडग और यादगिर के कुछ इलाकों में मूंग की बुवाई हुई है, लेकिन फसल की बेहतर वृद्धि के लिए जल्द अच्छी बारिश होना जरूरी है। यदि बारिश में और देरी होती है तो अंकुरित फसलें प्रभावित हो सकती हैं।

देश में सामान्य से 32 फीसदी कम बारिश
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, 15 जून तक देश में सामान्य से 32 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है।
इस अवधि में देश में औसतन 62.1 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, जबकि वास्तविक वर्षा केवल 42.4 मिमी दर्ज की गई। यही वजह है कि कई राज्यों में किसान अभी तक बड़े पैमाने पर खरीफ फसलों की बुवाई शुरू नहीं कर पाए हैं।
लातूर के दाल कारोबारी एन. कलंत्री का कहना है कि क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण तुअर की बुवाई लगभग ठप पड़ी हुई है।
अल नीनो की आशंका ने बढ़ाई चिंता
इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) के मानद सचिव सतीश उपाध्याय का कहना है कि फिलहाल स्थिति “वेट एंड वॉच” यानी इंतजार और निगरानी की बनी हुई है। उन्होंने बताया कि संभावित अल नीनो प्रभाव महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों के लिए चिंता का विषय है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि तुअर और उड़द जैसी फसलों की बुवाई जुलाई के मध्य तक की जा सकती है। इसलिए यदि अगले कुछ सप्ताह में मानसून सक्रिय होता है तो बुवाई में तेजी आने की संभावना बनी हुई है।
पर्याप्त बफर स्टॉक से राहत
दलहन उत्पादन को लेकर अनिश्चितता के बीच राहत की बात यह है कि केंद्र सरकार के पास फिलहाल 43 से 45 लाख टन का बफर स्टॉक उपलब्ध है। इससे जरूरत पड़ने पर बाजार में आपूर्ति बढ़ाकर दालों की कीमतों को नियंत्रित रखा जा सकता है।
फिर भी कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ सीजन के शुरुआती चरण में बुवाई में आई यह गिरावट चिंताजनक संकेत है। यदि जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई की शुरुआत में अच्छी बारिश नहीं होती, तो इसका असर दलहन उत्पादन, किसानों की आय और आने वाले महीनों में बाजार की आपूर्ति पर पड़ सकता है।
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