नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): यूरिया की कीमत: वैश्विक उर्वरक बाजार में भारत के लिए राहत की खबर है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यापारिक व्यवधान के बाद अप्रैल में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंची यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अब तेज गिरावट आई है। इससे भारत के लिए आयात लागत कम होने और सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का दबाव घटने की संभावना बढ़ी है।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विश्लेषण के मुताबिक, फरवरी 2026 में पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद यूरिया की कीमत करीब 400 डॉलर प्रति टन से बढ़कर अप्रैल में 850 डॉलर प्रति टन से ऊपर पहुंच गई थी। इसके बाद कीमतों में तेजी से सुधार हुआ और जून में यह करीब 453 डॉलर प्रति टन रह गई। यानी कुछ ही महीनों में अंतरराष्ट्रीय भाव लगभग आधा हो गया।
हालांकि, कीमतों में इस गिरावट को पूरी तरह सामान्य स्थिति की वापसी मानना जल्दबाजी होगी। जून 2026 में वैश्विक यूरिया कीमत करीब 572 डॉलर प्रति टन भी दर्ज की गई, जो जून 2025 के करीब 395 डॉलर प्रति टन से लगभग 45% अधिक थी। अलग-अलग बाजार और डिलीवरी आधार के कारण आंकड़ों में अंतर है, लेकिन दोनों संकेतक यह बताते हैं कि अप्रैल के शिखर से कीमतें काफी नीचे आई हैं, फिर भी बाजार पूरी तरह सस्ता नहीं हुआ है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यूरिया का सस्ता होना?
भारत यूरिया की घरेलू मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमत में बदलाव का सीधा असर सरकार की खरीद लागत और उर्वरक सब्सिडी पर पड़ता है।
संकट के दौरान बढ़ी कीमतों ने भारत की आयात लागत को काफी बढ़ाया था। विश्व बैंक के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही में वैश्विक उर्वरक मूल्य सूचकांक में तिमाही आधार पर 12% से अधिक की वृद्धि हुई। अप्रैल में यूरिया की कीमत 850 डॉलर प्रति टन से ऊपर चली गई थी।
अब कीमतों में नरमी का मतलब है कि समान मात्रा में यूरिया खरीदने के लिए सरकार को पहले की तुलना में कम विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ सकती है। यदि यह गिरावट आगे भी बनी रहती है, तो इससे खाद सब्सिडी के बजट पर भी दबाव कम हो सकता है।
नए भारतीय टेंडर से बाजार को मिला संकेत
भारत की सरकारी कंपनियों की ओर से जारी यूरिया आयात टेंडर बाजार की वास्तविक दिशा समझने का महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। हालिया भारतीय खरीद में अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं की प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और इससे खरीदारों को अपेक्षाकृत बेहतर कीमत हासिल करने में मदद मिली है।
जून में National Fertilizers Limited के एक बड़े टेंडर में करीब 1.7 मिलियन टन यूरिया के लिए सबसे कम ऑफर पूर्वी तट पर 444.90 डॉलर और पश्चिमी तट पर 449.30 डॉलर प्रति टन के आसपास रहे थे।
यह स्तर अप्रैल के 850 डॉलर से अधिक के वैश्विक भाव की तुलना में काफी कम है और यह बताता है कि भारत के आयातकों के लिए बाजार परिस्थितियां कुछ हद तक अनुकूल हुई हैं।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब?
भारतीय किसानों के लिए सबसे बड़ी राहत यह होगी कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट से यूरिया की उपलब्धता बनाए रखना आसान हो सकता है। सरकार को कम कीमत पर आयात करने का अवसर मिलता है, जबकि घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त वित्तीय दबाव भी कम हो सकता है।
यूरिया भारत में नियंत्रित कीमत पर किसानों को उपलब्ध कराया जाता है। इसलिए वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का पूरा असर खुदरा बाजार में तुरंत दिखाई नहीं देता। लेकिन आयात लागत कम होने से सरकार के लिए किसानों को सस्ती दर पर यूरिया उपलब्ध कराना अपेक्षाकृत आसान होता है।
खासकर धान, गेहूं, मक्का और अन्य नाइट्रोजन-आधारित फसलों के लिए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि खाद की लागत किसानों की कुल उत्पादन लागत का एक अहम हिस्सा है।
लेकिन होर्मुज संकट अभी पूरी तरह खत्म नहीं
यूरिया बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम अभी भी भू-राजनीतिक स्थिति है। WTO के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से बाहर जाने वाला उर्वरक व्यापार संघर्ष शुरू होने के बाद लगभग ठप हो गया था। इस क्षेत्र से वैश्विक यूरिया निर्यात का लगभग एक-चौथाई हिस्सा जुड़ा हुआ है।
विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी थी कि लंबे समय तक होर्मुज में व्यवधान, प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतें या उत्पादन एवं व्यापार में नई रुकावटें यूरिया की कीमतों को फिर ऊपर धकेल सकती हैं।

यानी मौजूदा गिरावट भारत के लिए राहत जरूर है, लेकिन इसे स्थायी कीमत गिरावट मानना जोखिम भरा होगा।
आगे किसानों के लिए क्या रहेगा अहम?
भारत के लिए अगले कुछ महीनों में तीन चीजें निर्णायक होंगी—अंतरराष्ट्रीय यूरिया कीमत, होर्मुज से उर्वरक आपूर्ति की स्थिति और भारत के सरकारी आयात टेंडर में मिलने वाले भाव।
यदि वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग सक्रिय रहते हैं और चीन सहित अन्य उत्पादक देशों से निर्यात उपलब्धता बढ़ती है, तो कीमतों में और नरमी संभव है। दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में तनाव फिर बढ़ा तो बाजार तेजी से पलट सकता है।
फिलहाल अप्रैल के रिकॉर्ड भाव से नीचे आई यूरिया कीमतें भारत सरकार और किसानों दोनों के लिए राहत का संकेत हैं। लेकिन चूंकि अंतरराष्ट्रीय कीमतें अभी भी पिछले साल से काफी ऊपर हैं, इसलिए भारत के लिए सस्ते आयात के साथ पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना ही सबसे महत्वपूर्ण रणनीति होगी।
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