नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): भारत में लंपी त्वचा रोग (Lumpy Skin Disease—LSD) एक बार फिर गोवंश के लिए बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है। 2022 के बड़े प्रकोप के बाद 2023-24 में मामलों में कमी आई थी, लेकिन 2025 से कई इलाकों में संक्रमण दोबारा सामने आया। इसी बीच, देश में LSD के लिए स्वदेशी और होमोलॉगस वैक्सीन उपलब्ध होने के बावजूद राज्यों में इसके इस्तेमाल की गति को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
सबसे अहम सवाल यह है कि जब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 2022 में Lumpi-ProVacInd जैसी LSD-विशिष्ट वैक्सीन विकसित कर ली थी, तो व्यापक स्तर पर टीकाकरण के लिए अब भी गोटपॉक्स वैक्सीन पर निर्भरता क्यों बनी हुई है?
लंपी त्वचा रोग: 2022 में तैयार हुई थी LSD वैक्सीन
ICAR के राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (ICAR-NRCE), हिसार और भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (ICAR-IVRI), बरेली ने मिलकर Lumpi-ProVacInd विकसित की थी। ICAR के अनुसार यह एक लाइव-अटेन्यूएटेड, होमोलॉगस LSD वैक्सीन है, जो LSD वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी और सेल-मीडिएटेड इम्यून प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए विकसित की गई। ICAR ने 2022 में ही इसके कमर्शियल उत्पादन के लिए तकनीक हस्तांतरण शुरू कर दिया था।
बाद में इस तकनीक को कई वैक्सीन निर्माताओं तक पहुंचाया गया। ICAR की वार्षिक रिपोर्ट में Biovet, Indian Immunologicals, Hester Biosciences और Institute of Veterinary Biological Products जैसे निर्माताओं का उल्लेख है।
इस बीच Biovet ने Biolumpivaxin नाम से LSD वैक्सीन बाजार में उतारी। कंपनी के अनुसार इसे CDSCO की मंजूरी मिली और मई 2025 में इसे लॉन्च किया गया। यह DIVA तकनीक पर आधारित मार्कर वैक्सीन है, जिससे लंपी त्वचा रोग से संक्रमित और टीकाकृत पशुओं के बीच अंतर करने में मदद मिल सकती है।
फिर गोटपॉक्स वैक्सीन पर निर्भरता क्यों?
2022 के प्रकोप के दौरान LSD-विशिष्ट वैक्सीन की व्यापक उपलब्धता नहीं थी। इसलिए सरकार ने हेटेरोलॉगस गोटपॉक्स वैक्सीन को LSD नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया। DAHD की पशु चिकित्सा उपचार गाइडलाइन में भी गोटपॉक्स वैक्सीन को LSD के खिलाफ रोगनिरोधी टीकाकरण के लिए अनुशंसित किया गया है।
हालांकि, हालिया शोध ने इस रणनीति की प्रभावशीलता पर नए सवाल खड़े किए हैं।
राजस्थान के अध्ययन में सिर्फ 21.7% फील्ड प्रभावशीलता
2025 में राजस्थान के पांच जिलों के 18 फार्मों में 8,930 मवेशियों पर किए गए अध्ययन में उत्तरकाशी स्ट्रेन आधारित गोटपॉक्स वैक्सीन की फील्ड प्रभावशीलता केवल 21.7% पाई गई। टीकाकृत पशुओं में LSD की घटना 11.2% थी, जबकि गैर-टीकाकृत पशुओं में यह 14.3% रही। अध्ययन में दोनों समूहों के बीच अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं पाया गया।
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी था कि 2023-24 में लंपी त्वचा रोग के कम मामलों के पीछे केवल गोटपॉक्स वैक्सीन को जिम्मेदार मानना उचित नहीं हो सकता। शोधकर्ताओं ने 2022 के प्रकोप के बाद बची प्राकृतिक प्रतिरक्षा की भूमिका की भी संभावना जताई। अध्ययन ने LSD-विशिष्ट होमोलॉगस वैक्सीन के साथ बड़े पैमाने पर टीकाकरण की जरूरत पर जोर दिया।

लंपी त्वचा रोग वैक्सीन: कीमत बनी बड़ी चुनौती
राज्यों के सामने दूसरा बड़ा मुद्दा वैक्सीन की लागत और बड़े पैमाने पर आपूर्ति का है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार गोटपॉक्स वैक्सीन की कीमत LSD-विशिष्ट वैक्सीन की तुलना में काफी कम है। ऐसे में सीमित बजट वाले राज्यों के लिए लाखों पशुओं का टीकाकरण महंगा पड़ सकता है।
हालांकि, जैसे-जैसे अधिक निर्माता LSD-विशिष्ट वैक्सीन का उत्पादन शुरू करेंगे, प्रतिस्पर्धा और बड़े पैमाने के उत्पादन से कीमतों में कमी आने की उम्मीद की जा सकती है। अप्रैल 2026 में Agrinnovate India ने Lumpi-ProVacInd तकनीक को Brilliant Bio Pharma को भी कमर्शियल उत्पादन के लिए लाइसेंस दिए जाने की जानकारी दी, जिससे भविष्य में आपूर्ति बढ़ने की संभावना है।
अब रणनीति पर पुनर्विचार की जरूरत
लंपी त्वचा रोग के दोबारा बढ़ते मामलों ने भारत की मौजूदा टीकाकरण रणनीति की समीक्षा की जरूरत बढ़ा दी है। गोटपॉक्स वैक्सीन ने 2022 के संकट में एक महत्वपूर्ण अंतरिम भूमिका निभाई, लेकिन नए फील्ड आंकड़े बताते हैं कि LSD नियंत्रण के लिए केवल इसी रणनीति पर लंबे समय तक निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता।
लंपी त्वचा रोग: अब चुनौती यह है कि LSD-विशिष्ट वैक्सीन की कीमत, उपलब्धता, उत्पादन क्षमता और राज्यों तक वितरण को कैसे सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, बीमारी की निगरानी, संक्रमित पशुओं का अलगाव और मक्खी-मच्छर जैसे वाहकों के नियंत्रण पर भी समानांतर ध्यान देना होगा।
आखिरकार, गोवंश में लंपी त्वचा रोग के कारण दूध उत्पादन, पशु स्वास्थ्य और पशुपालकों की आय पर पड़ने वाले नुकसान को देखते हुए भारत के लिए प्रभावी और टिकाऊ LSD टीकाकरण नीति अब केवल वैज्ञानिक मुद्दा नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा अहम सवाल बन चुकी है।
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