रिपोर्ट: पंकज दुबे, छत्तीसगढ़ ब्यूरो
रायपुर (कृषि भूमि ब्यूरो): जहां अधिकांश युवा उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद सरकारी या निजी नौकरी की तलाश में जुट जाते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की युवा उद्यमी ग्रेसी दुग्गा ने परंपरागत सोच से अलग रास्ता चुना। उन्होंने बीएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी के बजाय आधुनिक सूकरपालन (Pig Farming) को अपना कर न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि ग्रामीण उद्यमिता का ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो आज पूरे बस्तर अंचल के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया है।
बस्तर जिले के बकावंड विकासखंड के किंजोली गांव की रहने वाली ग्रेसी दुग्गा ने वैज्ञानिक तकनीकों, आधुनिक प्रबंधन और सरकारी योजनाओं का प्रभावी उपयोग करते हुए 1 करोड़ 12 लाख 10 हजार रुपये की लागत से अत्याधुनिक सूकरपालन इकाई स्थापित की। वर्तमान में उनके फार्म में 400 से अधिक सूकर हैं और यह इकाई क्षेत्र में व्यावसायिक पशुपालन का सफल उदाहरण बन चुकी है।
शिक्षा से मिली नई सोच, अवसर को बनाया व्यवसाय
वर्ष 2023 में उत्तराखंड के देहरादून से बीएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई पूरी करने के बाद ग्रेसी दुग्गा ने रोजगार के पारंपरिक विकल्पों के बजाय कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र में संभावनाओं को तलाशने का निर्णय लिया।
उन्होंने अध्ययन के दौरान सीखे वैज्ञानिक तरीकों को व्यवहार में उतारते हुए बस्तर क्षेत्र में सूकर मांस की बढ़ती मांग और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन की कमी को एक बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में पहचाना। उनका मानना था कि यदि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाया जाए तो सूकरपालन कम समय में बेहतर आय देने वाला लाभकारी व्यवसाय बन सकता है।
सरकारी योजना बनी सफलता की मजबूत नींव
बड़े स्तर पर परियोजना शुरू करने के लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता थी। इस दौरान पशु चिकित्सा विभाग ने परियोजना तैयार करने से लेकर तकनीकी मार्गदर्शन तक हर स्तर पर सहयोग दिया।
विभाग के सहयोग से 1.12 करोड़ रुपये की विस्तृत परियोजना तैयार की गई, जिसे भारत सरकार की नेशनल लाइव स्टॉक मिशन (National Livestock Mission) के अंतर्गत स्वीकृति मिली।
अनुसूचित जनजाति वर्ग से होने के कारण ग्रेसी दुग्गा को पहली ही आवेदन पर 30 लाख रुपये की सब्सिडी प्राप्त हुई। उनका कहना है कि यदि यह आर्थिक सहायता नहीं मिलती तो वे केवल 20 से 25 सूकरों के साथ छोटे स्तर पर ही व्यवसाय शुरू कर पातीं।
वैज्ञानिक प्रबंधन से मिली पहचान
ग्रेसी ने अपने फार्म के लिए तमिलनाडु से उन्नत नस्ल के सूकर मंगवाए। पशुपालन विभाग के चिकित्सकों और कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में टीकाकरण, पोषण, स्वास्थ्य परीक्षण और प्रजनन प्रबंधन को पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से संचालित किया गया।
मई 2025 में 100 मादा और 10 नर सहित कुल 110 प्रजनन योग्य सूकरों के साथ शुरू हुई यह परियोजना एक वर्ष के भीतर उल्लेखनीय सफलता तक पहुंच गई। जून 2026 तक फार्म में 202 प्रजनन योग्य वयस्क सूकर तथा करीब 206 पिगलेट्स सहित कुल संख्या 400 के पार पहुंच गई।
इस उपलब्धि ने यह साबित किया कि आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रबंधन और नियमित स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से पशुपालन को एक लाभकारी उद्योग में बदला जा सकता है।
पहली बिक्री ने बढ़ाया आत्मविश्वास
व्यवसाय का पहला बड़ा पड़ाव तब आया जब ग्रेसी दुग्गा ने 65 उन्नत नस्ल के पिगलेट्स की बिक्री की। प्रत्येक पिगलेट 6 हजार रुपये की दर से बिकने पर उन्हें लगभग 3 लाख 90 हजार रुपये की आय प्राप्त हुई।
इसके बाद उनके फार्म की पहचान लगातार बढ़ती गई और अब रायपुर सहित प्रदेश के विभिन्न बाजारों में नियमित रूप से उन्नत नस्ल के पिगलेट्स की आपूर्ति की जा रही है। इससे उनकी आय के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और पशुपालन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है।
ग्रेसी दुग्गा: ग्रामीण युवाओं के लिए बनी प्रेरणा
ग्रेसी दुग्गा की सफलता यह दर्शाती है कि शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और सरकारी योजनाओं का प्रभावी उपयोग कर गांवों में भी बड़े स्तर पर सफल उद्यम स्थापित किए जा सकते हैं।
उनका आधुनिक सूकरपालन फार्म आज केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि ग्रामीण युवाओं, विशेषकर महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और नवाचार का प्रेरक मॉडल बन चुका है। यह कहानी इस बात का भी प्रमाण है कि कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में आधुनिक दृष्टिकोण अपनाकर रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है।
ग्रेसी दुग्गा ने यह साबित कर दिया है कि यदि युवा नौकरी तलाशने के बजाय अवसरों की पहचान कर उद्यमिता की राह चुनें, तो गांवों से भी करोड़ों के सपनों को साकार किया जा सकता है। उनकी सफलता आत्मनिर्भर भारत की उस सोच को मजबूती देती है, जिसमें नवाचार, कौशल और वैज्ञानिक खेती ग्रामीण विकास के प्रमुख आधार बनते हैं।

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