नई दिल्ली, 31 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): जलवायु संकट, घटती खेती की जमीन और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच भारत में पशुपालन की तस्वीर उस सोच से कहीं ज्यादा व्यापक है, जिसे आमतौर पर सिर्फ “दूध के कारोबार” तक सीमित कर दिया जाता है। एक नई स्टडी बताती है कि देश में हर गाय और भैंस दूध बेचने के लिए नहीं पाली जाती। हकीकत यह है कि 38 प्रतिशत पशुपालक बाजार में दूध बेचते ही नहीं, बल्कि मवेशियों को पोषण, खेती, ईंधन और आजीविका के सहारे के रूप में देखते हैं।
यह अहम खुलासा Council on Energy, Environment and Water (CEEW) की ताज़ा रिपोर्ट में हुआ है। यह अध्ययन देश के 15 राज्यों के 7,300 से अधिक पशुपालक परिवारों पर आधारित है, जो भारत की लगभग 91 प्रतिशत पशुधन आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
दूध से आगे की सोच: मवेशी सिर्फ बाजार की चीज नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पशुपालन का रिश्ता बाजार से ज्यादा घर और खेत से जुड़ा है। बड़ी संख्या में परिवार ऐसे हैं जिनके लिए मवेशी दूध बेचने का जरिया नहीं, बल्कि घर के खाने-पीने, खेती के काम और रोजमर्रा की जरूरतों का आधार हैं। अध्ययन बताता है कि करीब 7 प्रतिशत पशुपालक ऐसे भी हैं जो दूध के लिए पशुपालन करते ही नहीं। वे मवेशियों को गोबर, खेती के काम या भविष्य में पशु बेचने के उद्देश्य से पालते हैं। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह हिस्सा 15 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
आज भी बैल और बैलगाड़ी पर निर्भर ग्रामीण भारत
तकनीक और मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद ग्रामीण भारत का बड़ा हिस्सा आज भी पारंपरिक साधनों पर टिका है। CEEW की रिपोर्ट बताती है कि 74 प्रतिशत पशुपालक गोबर का उपयोग खाद, ईंधन या बिक्री के लिए करते हैं। कई क्षेत्रों में बैल और बैलगाड़ी आज भी खेती और परिवहन का अहम साधन बने हुए हैं। यह साफ करता है कि पशुपालन सिर्फ आय का जरिया नहीं, बल्कि खेती की निरंतरता और ग्रामीण जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है।
देसी नस्लें: पशुपालन की रीढ़
रिपोर्ट के मुताबिक, देसी गायें भारतीय पशुपालन व्यवस्था की रीढ़ हैं। झारखंड, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में आधे से ज्यादा पशुपालक दूध बेचने के बजाय घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे विकसित डेयरी राज्यों में भी 30 प्रतिशत से अधिक परिवार मवेशियों के गैर-दुग्ध लाभों को ज्यादा महत्व देते हैं। देसी नस्लें कम दूध देती हैं, लेकिन वे कम लागत वाली, ज्यादा सहनशील और स्थानीय जलवायु के अनुकूल मानी जाती हैं।
नीतियों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
CEEW के अनुसार, देश की मौजूदा डेयरी नीतियां अभी भी मुख्य रूप से दूध उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित हैं, जबकि जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा विविध है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हर राज्य, हर क्षेत्र और हर पशुपालक की जरूरतें अलग हैं। ऐसे में एक जैसी नीति पूरे देश पर लागू करना व्यावहारिक नहीं है।
चारे की कमी: सबसे बड़ी चुनौती
अध्ययन में सामने आया है कि पशुपालकों के सामने सबसे बड़ी समस्या चारे की कमी है। हर चार में से तीन पशुपालक इस संकट से जूझ रहे हैं। चरागाह लगातार सिमट रहे हैं और चारा महंगा होता जा रहा है, जिससे पशुपालन की लागत बढ़ रही है। हैरानी की बात यह है कि करीब 80 प्रतिशत पशुपालकों को सरकारी चारा योजनाओं की जानकारी ही नहीं है, और सिर्फ 5 प्रतिशत ही इन योजनाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।
जलवायु बदलाव की सीधी मार
जलवायु परिवर्तन का असर अब पशुपालन पर भी साफ दिखने लगा है। CEEW की स्टडी में पाया गया कि 54 प्रतिशत भैंस पालने वाले, 50 प्रतिशत क्रॉसब्रीड मवेशी पालने वाले और 41 प्रतिशत देसी गाय पालने वाले पशुपालकों ने जलवायु से जुड़े नकारात्मक प्रभावों की बात स्वीकार की है। इनमें बीमारी, गर्मी से पशुओं की बेचैनी और पशुओं की मौत जैसी समस्याएं शामिल हैं। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि ज्यादा दूध की चाह में भैंस और क्रॉसब्रीड की ओर बढ़ती निर्भरता भविष्य में जलवायु जोखिम को और बढ़ा सकती है।
छोटे पशुपालक, बड़ी जिम्मेदारी
भारत में पशुपालन का चेहरा आज भी छोटे पशुपालक हैं। देश के करीब आधे पशुपालकों के पास सिर्फ एक या दो जानवर हैं। ये छोटे पशुपालक कुल दूध उत्पादन में लगभग 29 प्रतिशत योगदान देते हैं, जबकि कुल बिक्री में इनकी हिस्सेदारी 22 प्रतिशत के आसपास है। इसके उलट, बाजार का बड़ा हिस्सा मध्यम और बड़े पशुपालकों के हाथ में केंद्रित है।
रिपोर्ट क्या सुझाती है?
CEEW की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि पशुपालन से जुड़ी नीतियां पशुपालकों के प्रकार और क्षेत्रों के हिसाब से तैयार की जानी चाहिए। दूध के साथ-साथ गोबर, बायो-एनर्जी और जैविक खाद जैसे गैर-दुग्ध क्षेत्रों को भी नीति के केंद्र में लाने की जरूरत बताई गई है। इसके अलावा, चारा प्रबंधन, पशु आवास और नस्ल चयन में जलवायु जोखिम को शामिल करने पर भी जोर दिया गया है।
यह रिपोर्ट भारत में पशुपालन की उस सच्चाई को सामने लाती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। मवेशी सिर्फ दूध उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि पोषण, खेती, ऊर्जा और ग्रामीण जीवन का आधार हैं। अगर नीतियां इस व्यापक वास्तविकता को नहीं समझेंगी, तो न पशुपालक सुरक्षित रह पाएंगे और न ही पशुपालन को लंबे समय तक टिकाऊ बनाया जा सकेगा।
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