Global Grain Production: उर्वरकों की महंगाई से वैश्विक अनाज उत्पादन पर दबाव
नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): वैश्विक कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जहां 2025-26 के रिकॉर्ड उत्पादन के बाद 2026-27 में गिरावट की आशंका जताई जा रही है। International Grains Council और USDA Foreign Agricultural Service की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती उर्वरक कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और नीतिगत बदलाव इस गिरावट के प्रमुख कारण बन रहे हैं।
रिकॉर्ड उत्पादन से गिरावट की ओर
रिपोर्ट के मुताबिक, 2025-26 का सीजन वैश्विक अनाज उत्पादन के लिए ऐतिहासिक रहा है। कुल उत्पादन 2.474 अरब टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 6% अधिक है। गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसे प्रमुख फसलों ने इस वृद्धि में अहम भूमिका निभाई है।

गेहूं का उत्पादन 84.5 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जबकि मक्का 1.324 अरब टन के रिकॉर्ड स्तर पर जा सकता है। सोयाबीन उत्पादन भी बढ़कर 44.1 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। यह मजबूत उत्पादन वैश्विक खाद्य आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में मददगार साबित हुआ है।
Global Grain Production: 2026-27 में क्यों घटेगा उत्पादन?
हालांकि, 2026-27 के विपणन वर्ष के लिए तस्वीर बदलती नजर आ रही है। IGC के अनुसार, कुल उत्पादन में लगभग 2% की गिरावट आ सकती है और यह 2.414 अरब टन के स्तर पर आ सकता है। यह आंकड़ा भले ही ऐतिहासिक रूप से ऊंचा रहेगा, लेकिन गिरावट का संकेत कृषि क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों की ओर इशारा करता है।
सबसे बड़ा असर उर्वरकों की बढ़ती कीमतों का है। किसान लागत बढ़ने के कारण उर्वरकों का उपयोग कम कर सकते हैं, जिससे पैदावार और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
Global Grain Production: यूरोपीय संघ में स्थिति ज्यादा गंभीर
यूरोपियन यूनियन में उत्पादन में गिरावट अधिक स्पष्ट दिखाई दे रही है। यहां कुल अनाज उत्पादन 28.9 करोड़ टन से घटकर लगभग 27.7 करोड़ टन तक आ सकता है। इसका मुख्य कारण खेती के क्षेत्र में कमी और बढ़ती लागत है।
जनवरी 2026 से लागू हुए कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) ने उर्वरकों के आयात को महंगा बना दिया है। इससे किसानों पर लागत का अतिरिक्त बोझ पड़ा है, जो उत्पादन को सीधे प्रभावित कर रहा है।
भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा संकट
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर अस्थिरता ने ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। ईंधन की बढ़ती कीमतें कृषि लागत को और बढ़ा रही हैं, जिससे खेती महंगी होती जा रही है।
यह स्थिति केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक स्तर पर देखा जा रहा है। उर्वरक उत्पादन और आपूर्ति पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
भविष्य के लिए चेतावनी
विश्लेषकों ने 2027-28 के लिए और गंभीर चिंता जताई है। यदि उर्वरकों की कीमतें नियंत्रित नहीं होती हैं, तो किसान इनके उपयोग में और कटौती कर सकते हैं। इससे फसल की पैदावार ही नहीं, बल्कि प्रोटीन गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है।
खपत बढ़ रही, कीमतें भी चढ़ रही
Global Grain Production: उत्पादन में गिरावट के बावजूद वैश्विक खपत लगातार चौथे साल बढ़ने की राह पर है, हालांकि इसकी गति धीमी है। IGC के अनाज और तिलहन मूल्य सूचकांक में पहले ही 1% की मासिक वृद्धि दर्ज की गई है। खासतौर पर चावल की कीमतों में 5% की बढ़ोतरी ने बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है।
कुल मिलाकर, वैश्विक कृषि क्षेत्र एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। जहां एक ओर रिकॉर्ड उत्पादन ने उम्मीद जगाई है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती लागत और अनिश्चितताओं ने भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यदि समय रहते नीतिगत और आर्थिक समाधान नहीं निकाले गए, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
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