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चीनी की कीमतों में तेजी के बीच NFCSF ने मांगी वास्तविक स्टॉक रिपोर्ट, नवंबर में सप्लाई टाइट होने की आशंका

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): चीनी की कीमत: भारत में चीनी की कीमतों में हालिया तेजी के बीच चीनी उद्योग ने सरकार से देश में उपलब्ध वास्तविक स्टॉक की स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है। National Federation of Cooperative Sugar Factories (NFCSF) के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे के मुताबिक, सरकार द्वारा चीनी मिलों के भौतिक स्टॉक सत्यापन के बाद वास्तविक आंकड़े सामने आने से बाजार में चल रही अटकलों पर रोक लग सकती है और कीमतों में स्थिरता लौटने में मदद मिलेगी।

सरकार ने 28 जुलाई को चीनी कारोबारियों के लिए स्टॉक होल्डिंग सीमा लागू करने का फैसला किया था। यह व्यवस्था 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगी। इसके तहत कारोबारियों को अपने स्टॉक की जानकारी घोषित करनी होगी और हर सप्ताह ऑनलाइन पोर्टल पर स्टॉक अपडेट करना होगा। सरकार ने कहा था कि हालिया कीमत वृद्धि मौजूदा मांग-आपूर्ति स्थिति से पूरी तरह समर्थित नहीं है और कुछ मामलों में जमाखोरी, सट्टेबाजी तथा वास्तविक भौतिक आपूर्ति के बिना कागजी कारोबार ने कृत्रिम कमी की धारणा पैदा की है।

नवंबर में सप्लाई पर बढ़ सकता है दबाव

उद्योग जगत के अनुसार मौजूदा पेराई सीजन के अंत में उपलब्ध चीनी स्टॉक को लेकर बाजार में अलग-अलग अनुमान हैं। NFCSF का कहना है कि यदि 30 सितंबर तक स्टॉक करीब 35 लाख टन रह जाता है, तो अक्टूबर की लगभग 24 लाख टन मासिक मांग पूरी होने के बाद नवंबर में उपलब्धता काफी सीमित हो सकती है।

यही वजह है कि चीनी उद्योग अगले पेराई सीजन को सामान्य समय से पहले शुरू करने पर जोर दे रहा है। उद्योग ने 2026-27 सीजन की पेराई 10-15 दिन पहले शुरू करने का प्रस्ताव दिया है, ताकि त्योहारी अवधि के बाद नवंबर में बाजार में नई चीनी की पर्याप्त मात्रा पहुंचाई जा सके।

हालांकि, सरकार का रुख यह है कि देश में घरेलू खपत पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है। इसलिए मौजूदा स्थिति में वास्तविक स्टॉक आंकड़ों का सार्वजनिक होना बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

चीनी की कीमतों में तेजी से उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ी

चीनी की कीमतों में हालिया वृद्धि ने खुदरा बाजार पर दबाव बढ़ाया है। उद्योग के अनुसार दिल्ली-एनसीआर जैसे बाजारों में चीनी की खुदरा कीमतें कुछ सप्ताह पहले के लगभग ₹46-48 प्रति किलो से बढ़कर ₹55-56 प्रति किलो के आसपास पहुंची हैं।

सरकार की ओर से स्टॉक लिमिट लागू किए जाने के बाद थोक बाजार में चीनी की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है, लेकिन नवंबर की सप्लाई को लेकर बनी चिंता कीमतों पर दबाव बनाए रख सकती है।

इसका असर केवल घरेलू उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा। चीनी कीमत बढ़ने से मिठाई, बेकरी, पेय पदार्थ और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की लागत भी बढ़ सकती है। त्योहारी सीजन से पहले यह चिंता और महत्वपूर्ण हो जाती है।

इथेनॉल बनाम घरेलू चीनी की उपलब्धता

चीनी बाजार के लिए एक और बड़ा मुद्दा गन्ने के उपयोग का है। घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकार अगले सीजन में गन्ने के रस से इथेनॉल उत्पादन को सीमित करने पर विचार कर सकती है—हालांकि इस संबंध में अभी आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गन्ने को चीनी के बजाय इथेनॉल में मोड़ने से बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा घट सकती है। दूसरी ओर, इथेनॉल भारत की ऊर्जा नीति और पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए सरकार के सामने खाद्य महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।

गन्ना किसानों पर क्या होगा असर?

चीनी की कीमतों में मजबूती का असर अप्रत्यक्ष रूप से गन्ना किसानों के लिए सकारात्मक हो सकता है, क्योंकि बेहतर चीनी प्राप्ति से मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत होती है और किसानों के गन्ना भुगतान की क्षमता बढ़ती है।

2026-27 सीजन के लिए केंद्र सरकार ने गन्ने का Fair and Remunerative Price (FRP) 10.25% की बेसिक रिकवरी पर ₹365 प्रति क्विंटल तय किया है। सरकार के अनुसार इस फैसले से करीब 5 करोड़ गन्ना किसानों को लाभ होगा। 9.5% से कम रिकवरी वाले किसानों को भी ₹338.30 प्रति क्विंटल से कम भुगतान नहीं किया जाएगा।

चीनी की कीमत
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महाराष्ट्र में 2025-26 में गन्ना उत्पादन 1,099.70 लाख टन से बढ़कर 1,316.49 लाख टन होने का अनुमान है। राज्य में इसी सीजन में 210 चीनी मिलें चालू थीं और सरकार के अनुसार किसानों के FRP भुगतान का करीब 99.6% हिस्सा वितरित किया जा चुका था।

इसलिए किसानों के लिए तस्वीर फिलहाल मिश्रित है। ऊंची चीनी कीमतें मिलों की आय और भुगतान क्षमता को सहारा दे सकती हैं, लेकिन यदि सरकार घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए मिलों की बिक्री, निर्यात या इथेनॉल डायवर्जन पर कड़े प्रतिबंध लगाती है, तो मिलों की लाभप्रदता पर दबाव आ सकता है।

अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती

चीनी बाजार में मौजूदा स्थिति का अगला निर्णायक चरण सितंबर-अक्टूबर में होगा। सरकार के भौतिक स्टॉक सत्यापन के आंकड़े, नई पेराई शुरू होने की तारीख, इथेनॉल के लिए गन्ने के डायवर्जन की नीति और अक्टूबर-नवंबर की वास्तविक मांग—ये चार कारक कीमतों की दिशा तय करेंगे।

यदि नई पेराई अक्टूबर के मध्य तक सुचारू रूप से शुरू हो जाती है और नवंबर से बाजार में नई चीनी की पर्याप्त आवक होती है, तो मौजूदा सप्लाई चिंता कम हो सकती है। लेकिन यदि पेराई में देरी होती है और शुरुआती स्टॉक उम्मीद से कम निकलता है, तो त्योहारी मांग के बीच चीनी कीमतों पर फिर दबाव बढ़ सकता है।

ऐसे में NFCSF की मांग केवल उद्योग से जुड़ा मुद्दा नहीं है। वास्तविक स्टॉक आंकड़ों की पारदर्शिता उपभोक्ताओं, व्यापारियों, चीनी मिलों और गन्ना किसानों—सभी के लिए बाजार की सही तस्वीर सामने लाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

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