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GDP 7.8% Growth पर बड़ा सवाल: क्या आंकड़े छिपा रहे हैं अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर? क्या असली ग्रोथ 3% या 0% के करीब?

GDP 7.8% Growth

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): GDP 7.8% Growthभारत की अर्थव्यवस्था की GDP Growth Rate 7.8% बताए जाने के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या देश की आर्थिक तस्वीर वास्तव में उतनी ही मजबूत है, जितनी सरकारी आंकड़े दिखा रहे हैं। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की ओर से 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की वृद्धि का आंकड़ा सामने आया। यह पिछली अवधि में दर्ज 6.9% की वृद्धि से अधिक है।

लेकिन इस आंकड़े पर अर्थशास्त्रियों की ओर से सवाल उठाए गए हैं। JNU के रिटायर्ड अर्थशास्त्र प्रोफेसर और भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई किताबों के लेखक प्रो. अरुण कुमार ने GDP की गणना की पद्धति और उसमें असंगठित क्षेत्र के प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई हैं।

उनका कहना है कि GDP के आंकड़े और आम आदमी की आर्थिक स्थिति के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। उनके मुताबिक मजदूर, किसान, युवा और असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोग मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, जबकि आंकड़ों में अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार दिखाई जा रही है।

अप्रैल-मई में आर्थिक संकट के बीच 7.8% Growth पर सवाल

प्रो. अरुण कुमार के तर्क का एक अहम आधार 2026 के अप्रैल और मई महीने हैं। उनके मुताबिक उस समय पश्चिम एशिया संकट का असर सप्लाई चेन पर पड़ा था। कच्चे तेल और गैस की उपलब्धता प्रभावित हुई, खाद और एल्युमीनियम की कमी तथा कीमतों में बढ़ोतरी जैसी समस्याएं सामने आईं।

उन्होंने रसोई गैस की उपलब्धता और कीमतों को लेकर भी गंभीर स्थिति का जिक्र किया। उनके अनुसार कुछ जगहों पर महंगे दामों पर सिलेंडर मिलने की स्थिति बनी। उनका कहना है कि कम आय वाले मजदूरों के लिए इतनी बड़ी कीमत वृद्धि का असर उनकी वास्तविक आय और घरेलू खर्च पर सीधे पड़ता है।

इसी आधार पर प्रो. कुमार सवाल उठाते हैं कि जब अप्रैल-मई में अर्थव्यवस्था पर इस तरह के दबाव मौजूद थे, तो उस दौरान 7.8% की रिकॉर्ड GDP Growth कैसे संभव हो सकती है। हालांकि, यह उनका आर्थिक आकलन है, न कि इस रिपोर्ट में स्वतंत्र रूप से सत्यापित निष्कर्ष।

GDP Calculation की पद्धति पर क्या है आपत्ति?

प्रो. कुमार के अनुसार GDP के तिमाही आंकड़ों में पिछले वर्ष के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर मौजूदा वर्ष का अनुमान लगाया जाता है। उनका दावा है कि जब अर्थव्यवस्था अचानक किसी बड़े संकट या झटके से गुजरती है, तो ऐसी अनुमान आधारित पद्धति वास्तविक स्थिति को तुरंत पकड़ने में सक्षम नहीं हो सकती।

उनका तर्क है कि यदि पिछली अवधि अपेक्षाकृत मजबूत रही हो और मौजूदा अवधि में आर्थिक गतिविधियां कमजोर हों, तो अनुमान वास्तविक कमजोरी से ज्यादा मजबूत तस्वीर पेश कर सकता है।

उन्होंने नोटबंदी के दौर का उदाहरण भी दिया और दावा किया कि उस समय सरकारी आंकड़ों में करीब 8% Growth Rate दिखाई गई थी, जबकि उनके अपने विश्लेषण के अनुसार वास्तविक वृद्धि नकारात्मक रही थी।

असंगठित क्षेत्र: GDP की सबसे बड़ी चुनौती?

प्रो. अरुण कुमार के मुताबिक GDP अनुमान की दूसरी बड़ी समस्या असंगठित क्षेत्र को लेकर है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को सीधे मापने के बजाय संगठित क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है।

यही वह हिस्सा है जिस पर उनका सबसे बड़ा जोर है। उनका कहना है कि आर्थिक संकट का सबसे ज्यादा असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ता है। लेकिन GDP के अनुमान में इस्तेमाल होने वाला हाई-फ्रीक्वेंसी डेटा मुख्य रूप से संगठित अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को दर्शाता है।

इस डेटा में कारों की खरीद, GST कलेक्शन, हवाई यात्रा और रेलवे से माल ढुलाई जैसे संकेतक शामिल होते हैं। प्रो. कुमार के अनुसार ये संकेतक असंगठित क्षेत्र की वास्तविक आर्थिक गतिविधियों को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करते।

GDP 7.8% Growth7.8% नहीं, असली Growth सिर्फ 3%?

प्रो. कुमार ने GDP के आंकड़े को समझने के लिए संगठित और असंगठित क्षेत्र के अनुपात का उदाहरण दिया। उनके अनुसार संगठित क्षेत्र GDP का करीब 55% है, जबकि असंगठित क्षेत्र करीब 45% है। उनका कहना है कि यदि 7.8% की वृद्धि को सिर्फ संगठित क्षेत्र की वृद्धि मान लिया जाए, तो पूरी अर्थव्यवस्था की वृद्धि करीब 3% रह जाती है।

उन्होंने आगे कहा कि यदि मौजूदा अनुमान को ही गलत माना जाए, तो वास्तविक Growth Rate 0% के आसपास भी हो सकती है। यानी उनके आकलन में 7.8% का आंकड़ा अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं बताता।

94% Workforce की परेशानी का क्या?

प्रो. कुमार के अनुसार असंगठित क्षेत्र का महत्व सिर्फ GDP में उसके हिस्से तक सीमित नहीं है। उनका दावा है कि देश के कुल Workforce का करीब 94% हिस्सा असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे में यदि इस क्षेत्र में आय और रोजगार कमजोर होते हैं, तो इसका असर पूरे बाजार की मांग पर पड़ सकता है।

यही वजह है कि उनके मुताबिक सिर्फ GDP Growth Rate देखकर अर्थव्यवस्था की मजबूती का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। यदि लोगों की आय नहीं बढ़ रही है, रोजगार के अवसर घट रहे हैं और घरेलू मांग कमजोर है, तो ऊंची GDP Growth का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचना जरूरी नहीं है।

Service और Manufacturing Growth पर भी सवाल

प्रो. अरुण कुमार ने सर्विस सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की तेज वृद्धि के दावों पर भी सवाल उठाया। उनका तर्क है कि जिन महीनों में गैस की कमी, कारोबार में रुकावट और रोजगार से जुड़ी समस्याएं मौजूद थीं, उस दौरान सर्विस सेक्टर की बहुत तेज वृद्धि को जमीनी परिस्थितियों से जोड़ना मुश्किल है।

इसी तरह उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि और Capital Investment के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक उस समय आर्थिक अनिश्चितता, विदेशी निवेश से जुड़ी कमजोरी और रुपये में गिरावट जैसी परिस्थितियां थीं।

क्या 7.8% Growth आम आदमी की आर्थिक स्थिति बताती है?

यह पूरा विवाद आखिरकार एक बड़े सवाल पर आकर टिकता है – क्या GDP Growth Rate आम आदमी की आर्थिक स्थिति का सही पैमाना है?

प्रो. अरुण कुमार का जवाब स्पष्ट है। उनका कहना है कि मौजूदा आंकड़े मजदूर, किसान, युवा और असंगठित क्षेत्र के लोगों के संकट को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाते। उनका दावा है कि आर्थिक वृद्धि का बड़ा लाभ आबादी के ऊपरी 3-4% हिस्से तक सीमित है, जबकि बाकी आबादी आर्थिक दबाव महसूस कर रही है।

उनके मुताबिक लोग आय की कमी के बीच कर्ज लेने और सोना गिरवी रखने जैसे विकल्पों का सहारा ले रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ ऊपरी आय वर्ग और कॉर्पोरेट सेक्टर अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।

कुलमिलाकर, GDP की 7.8% Growth Rate निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत प्रदर्शन का संकेत मानी जा सकती है, लेकिन प्रो. अरुण कुमार का विश्लेषण इस बात पर सवाल उठाता है कि क्या यह आंकड़ा देश के सभी आर्थिक वर्गों की स्थिति को समान रूप से दर्शाता है।

उनका दावा है कि संगठित और असंगठित क्षेत्र को सही तरीके से देखने पर तस्वीर काफी अलग हो सकती है—विकास दर 3% तक सीमित हो सकती है और अनुमान की खामियों को शामिल करने पर यह 0% के आसपास भी पहुंच सकती है।

इसलिए असली बहस केवल इस बात पर नहीं है कि GDP कितनी तेजी से बढ़ रही है, बल्कि यह भी है कि उस Growth का लाभ किसे मिल रहा है, रोजगार कितना पैदा हो रहा है और आम लोगों की आय व मांग की स्थिति क्या है।

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