नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): भारत के तिलहन कारोबार में वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत आयात के बढ़ते दबाव के साथ हुई है। अप्रैल-जून 2026 की पहली तिमाही में देश ने 5,80,119 टन तिलहन का आयात किया, जबकि इसी अवधि में 2,09,197 टन तिलहन का निर्यात हुआ। आयात का मूल्य 3,146.98 करोड़ रुपये रहा, जबकि निर्यात से 2,618.68 करोड़ रुपये की आय हुई।
ये आंकड़े वाणिज्य मंत्रालय के विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के आंकड़ों पर आधारित हैं, जिन्हें द सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने संकलित किया है। सरकारी TradeStat प्रणाली भी जून 2026 तक के मासिक विदेशी व्यापार आंकड़े उपलब्ध कराती है।
पहली तिमाही का आयात पूरे साल के आंकड़े से ज्यादा
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वित्त वर्ष 2026-27 की केवल पहली तिमाही में ही भारत का तिलहन आयात 5.80 लाख टन पहुंच गया। यह मात्रा वित्त वर्ष 2025-26 के पूरे साल के 4.81 लाख टन आयात से भी अधिक है। पिछले वित्त वर्ष में आयात का कुल मूल्य करीब 3,130 करोड़ रुपये था।
इस तरह महज तीन महीनों में आयात मात्रा पिछले पूरे वित्त वर्ष के मुकाबले करीब 21 फीसदी अधिक हो गई है। यह स्थिति घरेलू बाजार में तिलहन की उपलब्धता, कीमतों और किसानों के लिए बाजार संकेतों को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
आयात में सोयाबीन का दबदबा
पहली तिमाही के तिलहन आयात में सोयाबीन सबसे बड़ा घटक रहा। कुल आयात मात्रा में इसकी हिस्सेदारी करीब 96 फीसदी और आयात मूल्य में लगभग 93 फीसदी रही।
अप्रैल-जून के दौरान भारत ने करीब 5.50 लाख टन सोयाबीन आयात किया, जिसका मूल्य लगभग 2,931 करोड़ रुपये रहा। उपलब्ध बाजार रिपोर्टों में भी घरेलू आपूर्ति की तंगी के बीच भारत में सोयाबीन आयात बढ़ने की बात सामने आई है।
सोयाबीन आयात का एक बड़ा हिस्सा अल्प विकसित देशों (LDCs) से भारत-अफ्रीका व्यापार व्यवस्था के तहत आया, जहां घरेलू बाजार में शून्य आयात शुल्क का लाभ मिलता है। इससे वैश्विक बाजार से सोयाबीन की खरीद भारतीय आयातकों के लिए अपेक्षाकृत आकर्षक बनी हुई है।
तिल दूसरा प्रमुख आयातित तिलहन
सोयाबीन के बाद तिल का स्थान रहा। अप्रैल-जून तिमाही में भारत ने 20,728 टन तिल का आयात किया, जिसका मूल्य करीब 189 करोड़ रुपये रहा। कुल आयात मात्रा में तिल की हिस्सेदारी 3.57 फीसदी और मूल्य में 6.01 फीसदी रही।
तिल के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में दक्षिण कोरिया, नाइजीरिया, सूडान, ब्राजील, सोमालिया, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और जापान शामिल रहे। इसके अलावा 3,225.73 टन सूरजमुखी बीज और 828.70 टन सरसों का आयात हुआ।
मूंगफली और तिल निर्यात की ताकत
आयात बढ़ने के बावजूद भारत के पास तिलहन निर्यात में मजबूत आधार मौजूद है। मूंगफली और तिल विदेशी बाजार से कमाई के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं।
अप्रैल-जून में छिलके वाली मूंगफली का निर्यात 1,33,861 टन रहा, जिससे करीब 1,550 करोड़ रुपये की आय हुई। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने कुल 6,63,809 टन मूंगफली का निर्यात किया था, जिसकी कीमत 6,092 करोड़ रुपये रही। इसके प्रमुख बाजारों में इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, चीन और फिलीपींस शामिल रहे।
वहीं, पहली तिमाही में 61,248 टन तिल का निर्यात हुआ और इससे करीब 945 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा आय हुई। ऊंचे प्रति-टन मूल्य के कारण तिल भारत के लिए खासा महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद बना हुआ है।
सरसों का निर्यात 9,067 टन रहा, जिसका मूल्य 70.22 करोड़ रुपये था। इसी तरह अलसी का 2,647.83 टन और कुसुम बीज का 1,004.91 टन निर्यात हुआ।
प्रोसेस्ड उत्पादों में निर्यात बढ़ाने की गुंजाइश
उद्योग के लिए अगली बड़ी संभावना केवल कच्चे तिलहन के निर्यात में नहीं, बल्कि वैल्यू-एडेड और प्रोसेस्ड उत्पादों में है। विशेषज्ञों का मानना है कि मूंगफली की गिरी के साथ-साथ ग्रेडेड, ब्लांच्ड और रोस्टेड उत्पादों के निर्यात पर जोर देने से प्रति इकाई अधिक मूल्य हासिल किया जा सकता है।
SEA के अनुसार, मूंगफली और तिल निर्यात आय का भरोसेमंद आधार हैं, लेकिन भारत को अपने निर्यात बाजार में विविधता लाने की जरूरत है। इसके लिए सरसों, अलसी और अन्य तिलहनों के लिए विदेशी बाजारों में स्थायी और व्यवस्थित मांग विकसित करनी होगी।
कुल मिलाकर, पहली तिमाही के आंकड़े भारत के तिलहन क्षेत्र की दोहरी तस्वीर दिखाते हैं—एक ओर घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात, खासकर सोयाबीन पर बढ़ती निर्भरता, और दूसरी ओर मूंगफली व तिल जैसे उत्पादों के जरिए मजबूत निर्यात क्षमता। आने वाले महीनों में घरेलू उत्पादन, वैश्विक कीमतों और आयात नीति का संतुलन इस क्षेत्र की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
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