नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): GMO विवाद – चीन द्वारा भारतीय चावल की खेप को वापस लौटाने की घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, चीनी बंदरगाहों पर भारतीय चावल के कुछ शिपमेंट में GMO (जेनेटिकली मॉडिफाइड) तत्व पाए जाने का दावा किया गया, जिसके चलते कई खेपों को रोक दिया गया या अस्वीकार कर दिया गया। इससे भारतीय निर्यातकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है और व्यापारिक अनिश्चितता का माहौल बन गया है।

GMO विवाद पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 23 अप्रैल 2026 को स्पष्ट बयान जारी किया। परिषद ने कहा कि भारत में व्यावसायिक स्तर पर GMO चावल की खेती को अनुमति नहीं दी गई है और न ही वर्तमान में किसी कार्यक्रम के तहत इस पर शोध किया जा रहा है। ICAR के अनुसार, भारत से निर्यात होने वाला चावल पूरी तरह से NON-GMO है।
GMO विवाद: निर्यातकों पर आर्थिक दबाव
GMO विवाद के बीच ICAR की सफाई के बावजूद चीन के बंदरगाहों पर खेपों के रोके जाने से निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। जहाजों के रुकने से विलंब शुल्क (डेमरेज) बढ़ रहा है और माल वापस लाने की स्थिति में अतिरिक्त लागत का बोझ भी बढ़ गया है। इससे व्यापारिक जोखिम और अनिश्चितता में वृद्धि हुई है।
चीन की खाद्य आयात नियंत्रण संस्था GACC ने तीन भारतीय कंपनियों को अस्थायी रूप से निलंबित भी कर दिया है, जिससे निर्यातकों में और चिंता बढ़ गई है। उद्योग से जुड़े लोग इसे तकनीकी से अधिक कूटनीतिक और नियामकीय मुद्दा मान रहे हैं।
GMO विवाद: TREACG ने केंद्र से मांगा हस्तक्षेप
छत्तीसगढ़ स्थित द राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ छत्तीसगढ़ (TREACG) ने इस मामले को गंभीर बताते हुए केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। एसोसिएशन ने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से आग्रह किया है कि इस विवाद को उच्च स्तर पर उठाया जाए।
TREACG का कहना है कि चीन के अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय कूटनीतिक वार्ता कर GMO परीक्षण के मुद्दे का समाधान किया जाना चाहिए। साथ ही जिन भारतीय कंपनियों को निलंबित किया गया है, उनका निलंबन तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। एसोसिएशन ने यह भी सुझाव दिया है कि भारत से जारी ‘नॉन-GMO’ प्रमाणपत्र को अंतिम मान्यता दी जाए।
भारत की साख पर असर की आशंका
भारतीय निर्यातकों का कहना है कि वे सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों और नियमों का पालन करते हैं। चावल की खेप को निर्यात से पहले मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में जांचा जाता है। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं भारत की वैश्विक साख पर असर डाल सकती हैं।
छत्तीसगढ़, जिसे “धान का कटोरा” कहा जाता है, भारत के चावल निर्यात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में इस विवाद का असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसानों और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
GMO विवाद: तत्काल समाधान की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा (GMO विवाद) केवल तकनीकी नहीं बल्कि कूटनीतिक स्तर पर समाधान मांगता है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो वैश्विक चावल बाजार में भारत की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
निर्यातकों का विश्वास बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की विश्वसनीयता को बरकरार रखने के लिए केंद्र सरकार का त्वरित और प्रभावी हस्तक्षेप बेहद आवश्यक माना जा रहा है।
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