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Crude Oil: ग्रीनलैंड पर US का रुख नरम, सप्लाई पर फोकस से कच्चे तेल की कीमतें स्थिर

नई दिल्ली, 21 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): ग्रीनलैंड को लेकर भू-राजनीतिक तनाव में नरमी और सप्लाई से जुड़े संकेतों पर ट्रेडर्स की करीबी नजर के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहीं। बुधवार को मामूली बढ़त के बाद वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) $60 प्रति बैरल के ऊपर बना रहा, जबकि ब्रेंट क्रूड लगभग $64 प्रति बैरल के स्तर पर बंद हुआ।

ग्रीनलैंड मुद्दे पर US का नरम रुख

तेल बाजार को सपोर्ट उस समय मिला जब Donald Trump ने संकेत दिया कि अमेरिका ग्रीनलैंड (आर्कटिक आइलैंड) को लेकर यूरोप पर संभावित टैरिफ लगाने के फैसले से पीछे हट सकता है। ट्रंप के अनुसार, इस मुद्दे पर एक संभावित समझौते का ढांचा तैयार हो गया है। इससे निवेशकों की चिंता कुछ हद तक कम हुई और जियोपॉलिटिकल प्रीमियम घटा।

सप्लाई और डिमांड पर नजर

हालांकि भू-राजनीतिक तनाव कम हुआ है, लेकिन सप्लाई से जुड़ी अनिश्चितताएं अभी भी बाजार के लिए अहम बनी हुई हैं। International Energy Agency (IEA) ने बुधवार को कहा कि इस साल वैश्विक तेल सप्लाई, डिमांड से काफी आगे रहने की संभावना है, हालांकि एजेंसी ने डिमांड ग्रोथ का अपना अनुमान थोड़ा बढ़ाया है।

उधर, इंडस्ट्री बॉडी American Petroleum Institute (API) के मुताबिक, अमेरिका में पिछले सप्ताह कच्चे तेल के भंडार में करीब 30 लाख बैरल की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अमेरिका तेल बाजार के सबसे पारदर्शी डेटा-सोर्स वाले देशों में गिना जाता है, इसलिए इन आंकड़ों का वैश्विक कीमतों पर असर पड़ता है।

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आउटपुट और सप्लाई चैन पर अपडेट

बड़े प्रोड्यूसिंग रीजन से सप्लाई को लेकर भी बाजार सतर्क है। कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम (CPC) का टर्मिनल फिर से शुरू होने जा रहा है, जिससे लोडिंग में इजाफा हो सकता है। इसके साथ ही, वेनेज़ुएला की सप्लाई भी धीरे-धीरे ग्लोबल मार्केट में लौट रही है, जो आगे चलकर कीमतों पर दबाव बना सकती है।

इस बीच, भारत की सबसे बड़ी निजी रिफाइनर Reliance Industries Limited ने एक बार फिर रूसी क्रूड ऑयल की खरीद की है। इस क्रूड की डिलीवरी फरवरी और मार्च में होने की उम्मीद है, जिससे एशियाई बाजार में सप्लाई फ्लो को लेकर संकेत मिलते हैं।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि निकट अवधि में कच्चे तेल की कीमतें एक सीमित दायरे में बनी रह सकती हैं। जियोपॉलिटिकल तनाव में नरमी कीमतों पर दबाव डाल सकती है, जबकि सप्लाई चेन से जुड़ी अनिश्चितताएं और ओपेक-प्लस की रणनीति बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।

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