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अक्टूबर तक कॉटन आयात शुल्क मुक्त, उद्योग को राहत; किसानों पर बढ़ेगा दबाव

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): केंद्र सरकार ने देश के वस्त्र एवं परिधान उद्योग को बड़ी राहत देते हुए 1 जून 2026 से 31 अक्टूबर 2026 तक कॉटन (कपास) के आयात को पूरी तरह शुल्क-मुक्त करने का फैसला किया है। वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग द्वारा 30 मई को जारी अधिसूचना के अनुसार इस अवधि में आयातित कॉटन पर न तो मूल सीमा शुल्क (Basic Customs Duty) लगेगा और न ही कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (AIDC) वसूला जाएगा।

सरकार का मानना है कि इस फैसले से घरेलू उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध होगा, उत्पादन लागत घटेगी और वैश्विक बाजार में भारतीय वस्त्र एवं परिधान निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी। हालांकि, किसान संगठनों और कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि शुल्क-मुक्त आयात से घरेलू कपास कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ सकता है।

11 प्रतिशत आयात शुल्क को मिली अस्थायी छूट

अब तक भारत में कॉटन आयात पर कुल 11 प्रतिशत शुल्क लागू था। पिछले कुछ महीनों से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास की ऊंची कीमतों के कारण स्पिनिंग मिलों, वस्त्र निर्माताओं और निर्यातकों की लागत बढ़ गई थी। उद्योग संगठनों ने सरकार से कई बार आयात शुल्क हटाने की मांग की थी।

सरकार ने उद्योग की मांग को स्वीकार करते हुए पांच महीने के लिए शुल्क हटाने का निर्णय लिया है। यह छूट खरीफ सीजन के दौरान लागू रहेगी, जब देश में नई कपास फसल की बुवाई और शुरुआती विकास का दौर होता है।

कॉटन
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टेक्सटाइल उद्योग को मिलेगा फायदा

केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय के अनुसार शुल्क-मुक्त आयात से देश में कपास की उपलब्धता बढ़ेगी और वस्त्र उद्योग को कच्चे माल की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। इससे उत्पादन लागत कम होगी और भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।

अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के चेयरमैन ए. शक्तिवेल ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों को इससे राहत मिलेगी। उनके अनुसार पिछले कई महीनों से कॉटन और यार्न की ऊंची कीमतें उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई थीं।

उन्होंने कहा कि आयात शुल्क हटने से कपास की आपूर्ति बढ़ेगी, उत्पादन लागत घटेगी और निर्यात को मजबूती मिलेगी। साथ ही उन्होंने स्पिनिंग मिलों से अपील की कि लागत में होने वाली बचत का लाभ यार्न खरीदारों तक भी पहुंचाया जाए।

किसानों को क्यों है चिंता?

सरकार के इस फैसले का दूसरा पहलू किसानों से जुड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशों से सस्ती कपास आने पर घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बन सकता है। यदि आयात बढ़ता है तो मंडियों में स्थानीय कपास की मांग प्रभावित हो सकती है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश के कई राज्यों में कपास की बुवाई शुरू हो चुकी है। किसान उम्मीद कर रहे थे कि नए सीजन में उन्हें बेहतर भाव मिलेंगे, लेकिन शुल्क-मुक्त आयात से बाजार का समीकरण बदल सकता है।

कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास की कीमतें कम रहीं और आयात बढ़ा, तो इसका असर किसानों के लाभ पर पड़ सकता है।

उद्योग संगठनों ने किया स्वागत

गारमेंट एक्सपोर्टर्स एंड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) के अध्यक्ष विजय जिंदल ने कहा कि पिछले छह महीनों में घरेलू बाजार में कपास के दाम 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गए थे। इसके अलावा बांग्लादेश और चीन को निर्यात बढ़ने से भी घरेलू उपलब्धता प्रभावित हुई थी।

उनके अनुसार ऊंची कीमतों के कारण भारतीय गारमेंट उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर पड़ रही थी। ऐसे में आयात शुल्क हटाने का फैसला उद्योग के लिए राहत लेकर आया है।

तेजी से बढ़ रहा है भारत का कॉटन आयात

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 सीजन (अक्टूबर-सितंबर) के पहले छह महीनों में भारत 6.74 लाख टन कपास का आयात कर चुका है। यह आंकड़ा 2024-25 के पूरे सीजन के 7.03 लाख टन आयात के लगभग बराबर पहुंच गया है।

वर्षकॉटन आयात (लाख टन)
2025-26*6.74
2024-257.03
2023-242.58
2022-232.48
2021-223.59
2020-211.87

*पहले छह महीने

बढ़ते आयात के बीच सरकार का यह नया निर्णय आने वाले महीनों में कॉटन बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जहां उद्योग इसे राहत के रूप में देख रहा है, वहीं किसानों की नजर अब इस बात पर होगी कि नए कपास सीजन में उन्हें उनकी उपज का कितना बेहतर मूल्य मिल पाता है।

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