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नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होने से पहले भारत सरकार ने यूरिया की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। देश में गैस आपूर्ति प्रभावित होने और घरेलू उत्पादन पर दबाव बढ़ने के बीच भारत ने 17 लाख टन यूरिया आयात करने के लिए वैश्विक कंपनियों से प्रस्ताव मांगे हैं।

सरकारी कंपनी नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) ने इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय टेंडर जारी किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब अगले महीने से देशभर में धान, मक्का, सोयाबीन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई तेज होने वाली है।

मध्य पूर्व संकट का असर भारत पर

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। मध्य पूर्व से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित होने के कारण भारत समेत दक्षिण एशिया के कई देशों में यूरिया उत्पादन प्रभावित हुआ है।

भारत में यूरिया उत्पादन मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। इस गैस का उपयोग अमोनिया बनाने में किया जाता है, जो यूरिया उत्पादन का सबसे अहम कच्चा माल है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा एलएनजी (LNG) आयात के जरिए पूरा करता है और इसका बड़ा स्रोत मध्य पूर्व है।

विशेषज्ञों के मुताबिक होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों पर जोखिम के कारण गैस आपूर्ति बाधित हुई है। इसी वजह से मार्च महीने में दक्षिण एशिया के कुछ उर्वरक संयंत्रों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा, जिससे उत्पादन में कमी आई।

20 जुलाई तक रवाना करनी होगी खेप

नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड द्वारा जारी नोटिस के अनुसार कुल 17 लाख टन यूरिया में से 9 लाख टन की आपूर्ति भारत के पश्चिमी तट के लिए की जाएगी, जबकि शेष यूरिया पूर्वी तट के बंदरगाहों के जरिए आएगा।

टेंडर में स्पष्ट किया गया है कि यूरिया की सभी खेपों को 20 जुलाई तक लोडिंग पोर्ट से रवाना करना अनिवार्य होगा ताकि खरीफ सीजन के दौरान किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराई जा सके।

सरकार का फोकस इस बार सप्लाई चेन को बाधित होने से बचाने और संभावित कमी की स्थिति से पहले ही निपटने पर है।

दोगुनी हुई कीमतें, बढ़ा आयात खर्च

वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतों में हाल के महीनों में तेज उछाल देखा गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार दुनिया की लगभग 45 प्रतिशत यूरिया सप्लाई फारस की खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरती है। ऐसे में संघर्ष बढ़ने के बाद बाजार में अनिश्चितता और कीमतों में तेजी आई है।

भारत ने पिछले टेंडर में लगभग 25 लाख टन यूरिया खरीदा था। उस समय कीमतें तनाव शुरू होने से पहले की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई थीं। इससे सरकार पर खाद सब्सिडी का बोझ भी बढ़ने की आशंका है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य पूर्व में हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहते हैं, तो आने वाले महीनों में उर्वरक बाजार में और अस्थिरता देखने को मिल सकती है।

यूरिया
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खरीफ सीजन के लिए कितनी है जरूरत?

उर्वरक मंत्रालय के अनुसार जून से सितंबर के बीच खरीफ फसलों के लिए देश को लगभग 3.9 करोड़ टन खाद की आवश्यकता होती है। इसमें यूरिया की मांग सबसे अधिक रहती है क्योंकि धान और मक्का जैसी फसलों में नाइट्रोजन आधारित खाद का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है।

सरकार ने फिलहाल राहत की बात बताते हुए कहा है कि देश के पास अभी लगभग 2 करोड़ टन खाद का स्टॉक उपलब्ध है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि खरीफ सीजन के दौरान मांग तेजी से बढ़ती है, इसलिए समय पर आयात बेहद जरूरी है।

किसानों और बाजार पर क्या होगा असर?

यूरिया आयात बढ़ने से किसानों को खरीफ सीजन में खाद की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि वैश्विक कीमतों में तेजी का असर सरकार की सब्सिडी लागत और कृषि बजट पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को भविष्य में उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने, गैस आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत विकसित करने और जैविक व वैकल्पिक खादों के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में तेजी से काम करना होगा।

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