नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): खाद सुरक्षा – भारतीय किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव और युद्ध जैसे भू-राजनीतिक तनावों के असर से बचाने के लिए संसद की स्थायी समिति ने सरकार को महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। लोकसभा में सोमवार को पेश की गई समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को खाद उत्पादन के लिए जरूरी कच्चे माल की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विदेशों में फॉस्फेट और पोटाश जैसे खनिज संसाधनों में रणनीतिक निवेश करना चाहिए। समिति का मानना है कि इससे देश की खाद आपूर्ति श्रृंखला अधिक सुरक्षित होगी और वैश्विक संकटों का असर किसानों तक कम पहुंचेगा।
विदेशों में खदानें और संयुक्त परियोजनाओं पर जोर
खाद सुरक्षा पर समिति ने सुझाव दिया है कि भारत को जॉर्डन, मोरक्को और दक्षिण अफ्रीका जैसे फॉस्फेट एवं पोटाश संसाधनों से समृद्ध देशों में खदानों में हिस्सेदारी या मालिकाना अधिकार हासिल करने की दिशा में प्रयास करने चाहिए। इसके साथ ही भारतीय कंपनियों को इन देशों में खाद उत्पादन संयंत्र स्थापित करने तथा संयुक्त उद्यम (जॉइंट वेंचर) विकसित करने की रणनीति अपनानी चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, यदि विदेशों में तैयार होने वाली खाद को दीर्घकालिक समझौतों के तहत भारत लाया जाए तो घरेलू बाजार में समय पर उपलब्धता सुनिश्चित होगी और वैश्विक कीमतों में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव सीमित रहेगा। समिति ने इसे खाद सुरक्षा के लिए एक दीर्घकालिक रणनीतिक कदम बताया है।
खाद सुरक्षा: आयात पर बढ़ती निर्भरता चिंता का विषय
संसदीय समिति ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि देश में खाद की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि उत्पादन क्षमता उसी गति से नहीं बढ़ सकी है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश में 70 मिलियन टन से अधिक उर्वरकों की खपत हुई, जिसमें लगभग 28 मिलियन टन आयात के माध्यम से उपलब्ध कराया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत यूरिया उत्पादन में लगभग 80 प्रतिशत आत्मनिर्भर है, लेकिन इसके उत्पादन के लिए आवश्यक प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। वहीं फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के लिए कच्चे माल का बड़ा हिस्सा और पोटाश की लगभग पूरी आवश्यकता आयात पर निर्भर है। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति बाधित होने या विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की खाद उपलब्धता और लागत पर पड़ता है।
भू-राजनीतिक संकटों से बढ़ता जोखिम
खाद सुरक्षा: समिति ने कहा कि पश्चिम एशिया सहित विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों में व्यवधान और अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता भारत की खाद आपूर्ति श्रृंखला के लिए जोखिम पैदा करती है। इसलिए खाद सुरक्षा के लिए केवल आयात पर निर्भर रहने के बजाय विदेशों में रणनीतिक निवेश और दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करना समय की आवश्यकता है।

खाद सुरक्षा: यूरिया को NBS के दायरे में लाने का विरोध
रिपोर्ट में समिति ने यूरिया को पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (Nutrient Based Subsidy) प्रणाली में शामिल करने के प्रस्ताव का भी विरोध किया है। समिति का कहना है कि यदि यूरिया की कीमत तय करने का अधिकार कंपनियों को दिया गया तो किसानों के लिए इसकी कीमत बढ़ सकती है।
वर्तमान में 45 किलोग्राम का यूरिया बैग किसानों को सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य 242 रुपये में उपलब्ध कराया जाता है। समिति ने कहा कि यह व्यवस्था किसानों के हित में है और इसे जारी रखा जाना चाहिए ताकि खेती की लागत नियंत्रित रहे।
रणनीतिक साझेदारी से मिलेगी दीर्घकालिक सुरक्षा
समिति ने सरकार से आग्रह किया है कि वह खाद के कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारियां विकसित करे। भारत पहले से जॉर्डन, मोरक्को, ओमान, ट्यूनीशिया, सेनेगल और दक्षिण अफ्रीका में कुछ संयुक्त उर्वरक परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है, लेकिन समिति का मानना है कि इन प्रयासों का विस्तार करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में खाद की उपलब्धता (खाद सुरक्षा)और मूल्य स्थिरता दोनों सुनिश्चित की जा सकें।
समिति का निष्कर्ष है कि यदि भारत अभी से कच्चे माल के स्रोतों पर रणनीतिक पकड़ मजबूत करता है, तो न केवल किसानों को समय पर खाद उपलब्ध होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की अस्थिरता और वैश्विक संकटों का असर भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
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