नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): TR4 फंगस: दुनिया के सबसे बड़े केला उत्पादक देश भारत के सामने एक नई कृषि चुनौती उभर रही है। ट्रॉपिकल रेस-4 (TR4) नामक फंगल बीमारी तेजी से फैल रही है और वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि इसे समय रहते TR4 फंगस को नियंत्रित नहीं किया गया तो यह देश की लगभग 50,000 करोड़ रुपये की केला अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।
विशेष चिंता की बात यह है कि यह बीमारी भारत में सबसे अधिक उगाई जाने वाली ग्रैंड नाइन (G-9) किस्म को प्रभावित कर रही है, जो देश के कुल केला उत्पादन और निर्यात का बड़ा हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि संक्रमण बढ़ने की स्थिति में लाखों किसानों की आय और उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
क्या है TR4 फंगस और क्यों है इतना खतरनाक?
TR4, जिसे फ्यूजेरियम विल्ट ट्रॉपिकल रेस-4 भी कहा जाता है, मिट्टी में रहने वाला एक फंगल रोग है। TR4 फंगस केले के पौधों की जड़ों पर हमला करता है और धीरे-धीरे पौधे की जल एवं पोषक तत्वों को अवशोषित करने की क्षमता को खत्म कर देता है।
TR4 फंगस संक्रमण के शुरुआती चरण में पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। इसके बाद पौधा कमजोर होता जाता है और अंततः पूरी तरह सूखकर नष्ट हो जाता है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह फफूंद मिट्टी में कई वर्षों तक जीवित रह सकता है। एक बार खेत संक्रमित हो जाने पर वहां लंबे समय तक केला उत्पादन करना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे दुनिया की सबसे विनाशकारी केला बीमारियों में से एक मानते हैं।
कई राज्यों में फैल चुका है TR4 फंगस संक्रमण
तिरुचिरापल्ली स्थित ICAR-National Research Centre for Banana (NRCB) के वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में TR4 TR4 फंगस संक्रमण का पहला मामला वर्ष 2015 में बिहार में दर्ज किया गया था।
इसके बाद यह बीमारी उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में पाई जा चुकी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि संक्रमण का दायरा बढ़ने से केला उत्पादन वाले नए क्षेत्रों पर भी खतरा मंडरा रहा है।
राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र के निदेशक Dr. R. Selvarajan के अनुसार, यदि संक्रमण की गति नहीं रोकी गई तो यह देश के प्रमुख केला उत्पादक क्षेत्रों में व्यापक नुकसान का कारण बन सकता है।
G-9 किस्म पर सबसे ज्यादा खतरा
भारत में बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली ग्रैंड नाइन (G-9) किस्म इस बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील मानी जा रही है। यह किस्म मुख्य रूप से टिश्यू कल्चर तकनीक से तैयार पौधों के जरिए उगाई जाती है।
टिश्यू कल्चर ने किसानों को अधिक उत्पादन और एक समान गुणवत्ता वाले पौधे उपलब्ध कराए हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यही आनुवंशिक एकरूपता अब जोखिम बन गई है। क्योंकि एक जैसी आनुवंशिक संरचना वाले पौधे किसी एक रोग के प्रति समान रूप से संवेदनशील होते हैं, जिससे बीमारी तेजी से बड़े क्षेत्र में फैल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि TR4 फंगस ने G-9 उत्पादन क्षेत्रों में व्यापक रूप से पैर पसार लिए, तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय उत्पादन और निर्यात पर भी दिखाई देगा।
TR4 फंगस नियंत्रण के लिए चल रहे हैं फील्ड ट्रायल
वैज्ञानिक फिलहाल बीमारी की रोकथाम और प्रबंधन के लिए विभिन्न रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात के प्रभावित इलाकों में फील्ड ट्रायल चलाए जा रहे हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि टिश्यू कल्चर पौधों के राज्यों के बीच बड़े पैमाने पर आवागमन से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। यदि संक्रमित रोपण सामग्री नए क्षेत्रों में पहुंचती है तो बीमारी को नियंत्रित करना और मुश्किल हो सकता है।
इसलिए विशेषज्ञ संक्रमित क्षेत्रों से रोगमुक्त क्षेत्रों में पौधों की आवाजाही पर सख्त निगरानी और क्वारंटीन उपाय लागू करने की सिफारिश कर रहे हैं।
किसानों की आय पर पड़ सकता है बड़ा असर
तमिलनाडु के त्रिची जिले के किसान जी. करिकालन के अनुसार, केले की खेती में प्रति एकड़ 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक का निवेश करना पड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में एक एकड़ से 25 से 30 टन तक उत्पादन प्राप्त होता है।
वर्तमान में उनके क्षेत्र में केले का बाजार मूल्य लगभग 32 रुपये प्रति किलोग्राम है। इस आधार पर किसान प्रति एकड़ 8 लाख से 9.6 लाख रुपये तक का सकल राजस्व प्राप्त कर सकते हैं।

| विवरण | अनुमानित आंकड़ा |
|---|---|
| प्रति एकड़ लागत | ₹1-1.5 लाख |
| उत्पादन | 25-30 टन |
| वर्तमान बाजार भाव | ₹32 प्रति किलोग्राम |
| संभावित सकल आय | ₹8-9.6 लाख प्रति एकड़ |
हालांकि करिकालन का कहना है कि कमजोर बाजार परिस्थितियों में कीमतें 10 से 15 रुपये प्रति किलोग्राम तक गिर जाती हैं। यदि ऐसे समय में TR4 फंगस का प्रकोप बढ़ता है तो किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि TR4 केवल एक फसल रोग नहीं, बल्कि कृषि विविधता और जैव सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। एक ही किस्म पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में ऐसे जोखिमों को और बढ़ा सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार शुरुआती पहचान, संक्रमित क्षेत्रों की निगरानी, रोगमुक्त रोपण सामग्री का उपयोग और सख्त क्वारंटीन उपाय ही इस बीमारी को राष्ट्रीय संकट बनने से रोक सकते हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भारत के केला क्षेत्र को उत्पादन, निर्यात और किसानों की आय के स्तर पर बड़ा आर्थिक झटका लग सकता है।
======
इन ख़बरों को भी पढ़ें…
महाराष्ट्र में 10 जून तक मानसून की उम्मीद कम, किसानों को इंतजार की सलाह
अक्टूबर तक कॉटन आयात शुल्क मुक्त, उद्योग को राहत; किसानों पर बढ़ेगा दबाव
एक इंस्पेक्शन और ठप हो गया 20 साल पुराना कारोबार, जापान ने भारतीय आमों पर लगाया बैन
भारत के बासमती चावल निर्यात में 27% गिरावट, किसानों और कारोबारियों की बढ़ी चिंता
Mango Storage: 12°C पर स्टोरेज से लंबे समय तक ताजा रहेंगे आम, चीनी शोध में मिला बड़ा समाधान