नई दिल्ली, 08 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): वित्त वर्ष 2025–26 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7.4 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान है, जो चालू वित्त वर्ष 2024–25 में दर्ज 6.5 फीसदी की वृद्धि से बेहतर है। हालांकि ताजा आधिकारिक आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि इस तेज आर्थिक रफ्तार के पीछे एक बड़ा असंतुलन छिपा हुआ है। देश की लगभग आधी आबादी को रोजगार देने वाले कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र की वृद्धि दर समग्र अर्थव्यवस्था की तुलना में काफी कमजोर बनी रहने वाली है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने बुधवार, 7 जनवरी को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) के प्रथम अग्रिम अनुमान (First Advance Estimates) जारी किए। इनके मुताबिक वित्त वर्ष 2025–26 में कृषि और संबद्ध गतिविधियों की वास्तविक वृद्धि दर 3.1 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि कुल अर्थव्यवस्था का GVA 7.3 फीसदी की रफ्तार से बढ़ सकता है।
सेवाओं और उद्योगों के दम पर ऊंची वृद्धि
NSO के अनुमानों के अनुसार कृषि को छोड़कर सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों की बेहतर परफॉर्मेंस के चलते समग्र आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी रहेगी। 2011–12 के स्थिर मूल्यों पर वित्त वर्ष 2025–26 में वास्तविक GDP 201.90 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है, जो पिछले वित्त वर्ष 2024–25 में 187.97 लाख करोड़ रुपये थी।
हालांकि यह तस्वीर समग्र स्तर पर सकारात्मक दिखती है, लेकिन क्षेत्रवार आंकड़े यह साफ संकेत देते हैं कि विकास की रफ्तार समान रूप से वितरित नहीं है।
कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की कमजोर तस्वीर
कृषि, पशुपालन, वानिकी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में 3.1 फीसदी की अनुमानित वृद्धि दर न सिर्फ GDP की आधी से भी कम है, बल्कि यह जनसंख्या वृद्धि से थोड़ा ही अधिक है। विशेषज्ञों के अनुसार यह दर ग्रामीण आय में ठोस सुधार लाने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
इसके साथ ही बिजली और जल आपूर्ति जैसी उपयोगिता सेवाओं में 2.1 फीसदी की सीमित वृद्धि का अनुमान है, जबकि खनन क्षेत्र में हल्की गिरावट की आशंका जताई गई है।
सेवाएं और निर्माण बने विकास के इंजन
इसके उलट, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाएं, साथ ही लोक प्रशासन और रक्षा से जुड़ी सेवाएं 9.9 फीसदी की तेज दर से बढ़ सकती हैं। व्यापार, होटल, परिवहन और संचार से जुड़ी सेवाओं में 7.5 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है।
रोजगार सृजन के लिहाज से अहम माने जाने वाले विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र दोनों में लगभग 7 फीसदी की वास्तविक वृद्धि अनुमानित है। इससे गैर-कृषि रोजगार को कुछ सहारा मिल सकता है, लेकिन यह कृषि क्षेत्र की सुस्ती की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा।
ग्रामीण मांग पर क्यों बनी हुई है चिंता
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कृषि की कमजोर वृद्धि दर यह समझाती है कि ग्रामीण खपत शहरी मांग के बराबर क्यों नहीं बढ़ पा रही है। निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE), जो GDP का आधे से अधिक हिस्सा है, वित्त वर्ष 2025–26 में लगभग 7 फीसदी की वास्तविक वृद्धि दर्ज कर सकता है। हालांकि यह समग्र वृद्धि दर के अनुरूप है, लेकिन इसके भीतर ग्रामीण-शहरी असमानता छिपी हुई है।
NSO के अनुसार, वित्त वर्ष 2025–26 में प्रति व्यक्ति वास्तविक GDP ₹1,42,119 रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.5 फीसदी अधिक है। वहीं प्रति व्यक्ति वास्तविक उपभोग में केवल 6 फीसदी से थोड़ा अधिक की वृद्धि अनुमानित है। विश्लेषकों का कहना है कि इन लाभों का वितरण समान नहीं है और कृषि परिवारों की आय में बढ़ोतरी शहरी सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों के मुकाबले कहीं धीमी है।
बजट 2026–27 के लिए संकेत
GDP के ये अनुमान केंद्रीय बजट 2026–27 की तैयारियों के लिए अहम माने जा रहे हैं। जब कृषि की वृद्धि दर समग्र अर्थव्यवस्था की आधी से भी कम है, तब न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), उर्वरक सब्सिडी और ग्रामीण रोजगार योजनाओं के जरिए समर्थन बनाए रखने का दबाव सरकार पर बना रह सकता है।
नई दिल्ली स्थित एक नीति संस्थान के एक अर्थशास्त्री के अनुसार, “ये आंकड़े अगले बजट के लिए एक स्पष्ट दुविधा पैदा करते हैं। ग्रामीण और कृषि क्षेत्र में दबाव बना हुआ है, लेकिन पूंजीगत व्यय में कटौती से विकास कमजोर पड़ सकता है, जबकि सब्सिडी बढ़ाने से राजकोषीय घाटे के लक्ष्य प्रभावित होंगे।”
बाहरी जोखिम और आयात दबाव
आंकड़े बाहरी जोखिमों की ओर भी इशारा करते हैं। वित्त वर्ष 2025–26 में आयात के 14.4 फीसदी की वास्तविक दर से बढ़ने का अनुमान है, जो निर्यात में 6.4 फीसदी की अनुमानित वृद्धि से कहीं अधिक है। यदि वैश्विक जिंस कीमतों में उछाल आता है, तो इससे चालू खाता संतुलन पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि महंगाई में हाल के महीनों में नरमी आई है, लेकिन अधिकारी मानते हैं कि खाद्य और ऊर्जा कीमतें अब भी मौसम संबंधी झटकों और वैश्विक बाजारों की अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनी हुई हैं। इससे भविष्य में सब्सिडी का दबाव दोबारा बढ़ सकता है।
NSO ने स्पष्ट किया है कि ये प्रथम अग्रिम अनुमान नवंबर 2025 तक उपलब्ध आंशिक आंकड़ों पर आधारित हैं और आगे इनमें संशोधन किया जा सकता है। द्वितीय अग्रिम अनुमान और 2022–23 को नया आधार वर्ष मानते हुए संशोधित ऐतिहासिक GDP आंकड़े 27 फरवरी 2026 को जारी किए जाएंगे।
फिलहाल, वित्त वर्ष 2025–26 के ये अनुमान एक जानी-पहचानी नीतिगत चुनौती को फिर से सामने लाते हैं—तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था, जिसकी सबसे कमजोर कड़ी अब भी कृषि क्षेत्र बना हुआ है। यही कमजोरी ग्रामीण मांग को दबाए रखती है और आने वाले बजट चक्र में सरकार के लिए राजकोषीय फैसलों को और जटिल बना सकती है।
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