नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): Rupee hits all-time low: भारतीय मुद्रा बाजार में मंगलवार, 12 मई को बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर 95.50 तक गिर गया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव तथा वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता ने रुपये पर भारी दबाव बनाया है। इसी के साथ घरेलू बॉन्ड मार्केट में भी बिकवाली बढ़ी और 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड 7 प्रतिशत के स्तर को पार कर गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह (Rupee hits all-time low) गिरावट सिर्फ मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर महंगाई, आयात लागत, निवेशक भावना और आम लोगों के खर्च तक दिखाई दे सकता है।
रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया
सोमवार को रुपया 95.31 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ था, लेकिन मंगलवार को यह और कमजोर होकर 95.50 प्रति डॉलर पर खुला। यह अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के मुताबिक वैश्विक बाजार में “रिस्क-ऑफ सेंटिमेंट” बढ़ने से निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख किया है। इसका फायदा अमेरिकी डॉलर को मिला, जबकि उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा।
फरवरी के आखिर में ईरान संघर्ष बढ़ने के बाद से रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बीच-बीच में हस्तक्षेप कर बाजार में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन बाजार का समग्र रुझान अब भी कमजोर बना हुआ है।
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ी चिंता
रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर “लाइफ सपोर्ट पर” है। उनके बयान के बाद बाजार में यह आशंका बढ़ गई कि दोनों देशों के बीच तनाव लंबे समय तक जारी रह सकता है।
ट्रंप ने ईरानी तेल निर्यात, अमेरिकी नौसेना पर लगी पाबंदियों और युद्ध से हुए नुकसान के मुआवजे जैसे कई मुद्दों पर असहमति की बात कही। इसके बाद वैश्विक बाजार में तेल सप्लाई को लेकर चिंता और बढ़ गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक इलाकों में शामिल है। यहां किसी भी तरह का संघर्ष या सप्लाई बाधा वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकती है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude की कीमत लगभग 1 प्रतिशत बढ़कर 105.22 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। फरवरी के अंत से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 46 प्रतिशत की तेजी आ चुकी है।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और मुद्रा पर पड़ता है। तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है। इसका असर रुपये की कीमत पर पड़ता है।
ING बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ईरान के आसपास बढ़ती हलचल के कारण तेल की कीमतें बेहद संवेदनशील बनी हुई हैं और सप्लाई में किसी भी बाधा का बड़ा असर देखने को मिल सकता है।
महंगाई और करंट अकाउंट डेफिसिट की चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की गिरावट से भारत में आयातित महंगाई बढ़ सकती है। पेट्रोल, डीजल, गैस और अन्य आयातित उत्पाद महंगे हो सकते हैं, जिसका असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
इसके अलावा भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। जब आयात लागत बढ़ती है और निर्यात अपेक्षाकृत कमजोर रहता है, तो विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ जाता है।
बाजार विश्लेषकों के मुताबिक यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
Rupee hits all-time low: बॉन्ड मार्केट पर भी दबाव
ग्लोबल जियोपॉलिटिकल तनाव और महंगाई की चिंताओं का असर घरेलू डेट मार्केट पर भी दिखाई दिया। भारत के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7 प्रतिशत के स्तर को पार कर गई।
मंगलवार को 10 साल की बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7.031 प्रतिशत पहुंच गई, जो 0.047 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी दर्शाती है। बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी का मतलब है कि निवेशक सरकारी बॉन्ड बेच रहे हैं और बाजार में जोखिम को लेकर चिंता बढ़ रही है।
| संकेतक | ताजा स्थिति |
|---|---|
| डॉलर के मुकाबले रुपया | 95.50 |
| पिछला बंद स्तर | 95.31 |
| Brent Crude | $105.22 प्रति बैरल |
| 10 साल बॉन्ड यील्ड | 7.031% |
| फरवरी में तेल कीमत | $72.50 प्रति बैरल |
| मौजूदा तेल कीमत | $105 के करीब |
बॉन्ड यील्ड क्यों महत्वपूर्ण है
सरकारी बॉन्ड, जिन्हें G-Secs भी कहा जाता है, सरकार द्वारा जारी की जाने वाली कम जोखिम वाली डेट सिक्योरिटीज होती हैं। इनमें निवेशकों को निश्चित ब्याज मिलता है और मैच्योरिटी पर मूलधन लौटाया जाता है।
जब बाजार में जोखिम बढ़ता है और निवेशक बॉन्ड बेचने लगते हैं, तो उनकी कीमत गिरती है और यील्ड बढ़ जाती है। इसलिए बॉन्ड यील्ड को अक्सर बाजार की आर्थिक चिंताओं का संकेत माना जाता है।
बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट के अनुसार इस महीने 10 साल की बॉन्ड यील्ड 6.9 प्रतिशत से 7.1 प्रतिशत के बीच रह सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जोखिम फिलहाल ऊपर की तरफ बना हुआ है।
Rupee hits all-time low: सरकार और RBI के सामने चुनौती
Rupee hits all-time low- रुपये की गिरावट और बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने सरकार और RBI दोनों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। एक तरफ महंगाई को नियंत्रित रखना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक विकास को भी बनाए रखना होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में फ्यूल की खपत कम करने के लिए वर्क-फ्रॉम-होम को बढ़ावा देने और गैर-जरूरी यात्रा कम करने की बात कही थी। बाजार इसे ऊर्जा संकट से निपटने की रणनीति के तौर पर देख रहा है।
Rupee hits all-time low – विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में RBI डॉलर बेचकर रुपये को सहारा दे सकता है। हालांकि यदि वैश्विक तनाव बढ़ता है और तेल की कीमतों में और तेजी आती है, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
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