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राजस्थान की 80 तहसीलें सूखाग्रस्त घोषित, किसानों के कृषि ऋण की वसूली 6 महीने स्थगित

जयपुर (कृषि भूमि ब्यूरो): राजस्थान में कम बारिश और खरीफ फसलों को हुए नुकसान के बाद राज्य सरकार ने 14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। इनमें 69 तहसीलों को गंभीर और 11 को मध्यम सूखा प्रभावित श्रेणी में रखा गया है। आपदा प्रबंधन एवं राहत विभाग की ओर से 24 और 25 अक्टूबर 2026 को जारी अधिसूचनाओं के अनुसार, यह घोषणा प्रकाशन की तारीख से छह महीने तक प्रभावी रहेगी। इससे प्रभावित क्षेत्रों में किसानों और पशुपालकों के लिए राहत उपाय लागू करने का रास्ता खुल गया है।

राज्य में सूखे का आकलन कम बारिश, सतही और भूजल की उपलब्धता में कमी तथा खड़ी फसलों की स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया। केंद्र सरकार की सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016 और राष्ट्रीय सूखा निगरानी पोर्टल से प्राप्त जानकारी भी आकलन का आधार बनी।

जोधपुर में सबसे अधिक 12 तहसीलें प्रभावित

जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, जोधपुर में सबसे अधिक 12 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। बाड़मेर और जालोर में 10-10, बालोतरा में नौ और पाली में आठ तहसलें प्रभावित हैं। डूंगरपुर, जैसलमेर और फलोदी में सात-सात तहसलों को सूची में शामिल किया गया है।

राजस्थान के जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून से 30 सितंबर 2026 के बीच राज्य में 350.83 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 424.71 मिलीमीटर है। यानी मानसून के दौरान बारिश सामान्य से करीब 17.4 प्रतिशत कम रही। राज्य के 693 निगरानी वाले बांधों में जल भंडारण भी उनकी कुल क्षमता का 62.16 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि पिछले वर्ष इसी तारीख को यह 90.19 प्रतिशत था। पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर क्षेत्र में जल भंडारण की स्थिति विशेष रूप से कमजोर रही।

चारा डिपो और कृषि ऋण में राहत

सूखाग्रस्त घोषित होने के बाद प्रभावित क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारा डिपो खोलने जैसे कदम उठाए जा सकेंगे। सरकार ने कृषि ऋणों की वसूली छह महीने तक स्थगित करने का फैसला भी किया है। इससे उन किसानों को अस्थायी राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें फसल नुकसान और खेती की लागत के बीच आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

हालांकि, ऋण वसूली स्थगित होने से किसानों का मूल कर्ज समाप्त नहीं होता। राहत का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित वित्तीय संस्थानों में आदेश किस तरह लागू किया जाता है और प्रभावित किसानों तक सहायता कितनी जल्दी पहुंचती है। चारे की उपलब्धता भी अहम होगी, क्योंकि बारिश की कमी का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पशुपालन और ग्रामीण परिवारों की आय पर भी पड़ता है।

कई राज्यों में बढ़ा सूखे का दायरा

राजस्थान में सूखे की घोषणा ऐसे समय हुई है, जब 2026 के खरीफ सीजन में देश के कई कृषि प्रधान राज्यों ने भी सूखा प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में प्रशासनिक इकाइयों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है।

  • महाराष्ट्र: राज्य में 358 तालुकों में से 305 को सूखा प्रभावित बताया गया है।

  • कर्नाटक: कुल 240 तालुकों में से 226 सूखाग्रस्त घोषित किए गए हैं।

  • तेलंगाना: 33 जिलों में से 31 जिलों के 365 मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। इनमें 111 गंभीर और 254 मध्यम सूखा प्रभावित हैं।

  • आंध्र प्रदेश: उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 21 जिलों के 388 मंडल सूखा प्रभावित श्रेणी में हैं, जिनमें 283 गंभीर और 105 मध्यम श्रेणी में रखे गए हैं।

  • गुजरात: देवभूमि द्वारका, पोरबंदर, जामनगर और कच्छ सहित चार जिलों में सूखे की स्थिति को देखते हुए राहत उपायों की घोषणा की गई है।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि सूखे का असर अलग-अलग राज्यों में अलग स्तर पर सामने आ रहा है। हालांकि, राज्यों की प्रशासनिक इकाइयों और सूखा आकलन के मानकों में अंतर होने के कारण केवल प्रभावित तहसीलों, तालुकों या मंडलों की संख्या के आधार पर नुकसान की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

किसानों की आय और रबी की बुवाई पर नजर

खरीफ सीजन में बारिश की कमी का असर आने वाले महीनों में भी बना रह सकता है। मिट्टी में नमी कम होने, जलाशयों में घटते भंडारण और सिंचाई की बढ़ती जरूरतों के कारण रबी फसलों की बुवाई और उत्पादन पर दबाव पड़ सकता है। पशुपालकों के लिए चारे की लागत बढ़ने का जोखिम भी बना रहेगा।

ऐसे में फसल नुकसान के आकलन, पात्र किसानों को समय पर आर्थिक सहायता, कृषि ऋण में राहत और पशुओं के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध कराने जैसे कदम महत्वपूर्ण होंगे। साथ ही, पेयजल की व्यवस्था और स्थानीय जल संसाधनों का प्रबंधन भी ग्रामीण संकट को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा।

राजस्थान में छह महीने के लिए सूखा अधिसूचना जारी होना राहत उपायों की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम है। अब इसका प्रभाव इस बात से तय होगा कि राहत योजनाएं कितनी तेजी से लागू होती हैं और प्रभावित किसानों तथा पशुपालकों तक उनका लाभ किस हद तक पहुंचता है।

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