मुंबई/नई दिल्ली, 14 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): ईरान में जारी राजनीतिक अशांति, स्थानीय मुद्रा रियाल की तेज गिरावट और अमेरिका की ओर से संभावित 25% टैरिफ की धमकी ने भारत के बासमती चावल निर्यात को गंभीर संकट में डाल दिया है। एग्रीकल्चर और कमोडिटी मार्केट से जुड़े सूत्रों के अनुसार, ईरान को होने वाली नई शिपमेंट लगभग रुक गई है, जिससे किसानों, राइस मिलर्स और निर्यातकों तीनों पर दबाव बढ़ गया है।
भारत, ईरान का सबसे बड़ा बासमती चावल आपूर्तिकर्ता है। कुल ईरानी आयात में चावल की हिस्सेदारी करीब दो-तिहाई है, लेकिन मौजूदा हालात में पेमेंट रिस्क और फॉरेक्स ट्रांसफर की दिक्कतों ने कारोबार को ठंडा कर दिया है।
ट्रंप टैरिफ का डर, नए कॉन्ट्रैक्ट पर ब्रेक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों को अमेरिका के साथ अपने व्यापार पर 25% टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है। कमोडिटी ट्रेडर्स का कहना है कि इस बयान के बाद भारतीय निर्यातक ईरानी खरीदारों के साथ नए कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से हिचकिचा रहे हैं। उनके अनुसार, “प्रस्तावित 25% लेवी भारतीय बासमती चावल सेक्टर के लिए एक अतिरिक्त जोखिम है। पहले से ही पेमेंट और लॉजिस्टिक्स की समस्या बनी हुई है।”
किसानों तक पहुंचेगा असर
एग्रीकल्चर मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान को निर्यात रुकने से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के बासमती किसानों पर असर पड़ सकता है। निर्यात मांग कमजोर होने से मंडियों में कीमतों पर दबाव और मिलर्स द्वारा खरीद में सुस्ती जैसे संकेत दिखने लगे हैं।
नई दिल्ली स्थित एक निर्यातक ने बताया कि पिछले दो महीनों में भेजी गई शिपमेंट के भुगतान को लेकर गंभीर अनिश्चितता है। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) के अनुसार, कई ईरानी आयातक भारत को पेमेंट भेजने में असमर्थता जता चुके हैं।
ईरान सरकार ने खाद्य आयातकों को मिलने वाली सब्सिडी वाली विदेशी मुद्रा सुविधा भी फिलहाल निलंबित कर दी है, जिससे बासमती चावल का आयात ईरानी बाजार में और महंगा हो गया है।
कमोडिटी एनालिस्ट्स के मुताबिक, पश्चिमी प्रतिबंध, कमजोर अर्थव्यवस्था और बढ़ती महंगाई के चलते ईरानी रियाल में भारी गिरावट आई है। यही वजह है कि आयातकों की खरीद क्षमता कमजोर हुई है और भारत से चावल मंगाना मुश्किल हो गया है।
भारत–ईरान एग्री ट्रेड में गिरावट
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत और ईरान के बीच व्यापार में बीते कुछ वर्षों में तेज गिरावट दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2018-19 में जहां भारत का ईरान को कुल निर्यात 3.51 अरब डॉलर था, वहीं वित्त वर्ष 2024-25 में यह घटकर सिर्फ 1.24 अरब डॉलर रह गया है। इसी तरह, भारत का ईरान से आयात भी 2018-19 के 13.53 अरब डॉलर के स्तर से गिरकर मात्र 440 मिलियन डॉलर पर सिमट गया है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स (FIEO) के अनुसार, यदि मौजूदा भू-राजनीतिक और आर्थिक हालात लंबे समय तक बने रहते हैं, तो भारतीय एग्री एक्सपोर्ट सेक्टर को ईरान के बजाय अन्य वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर अधिक निर्भर होना पड़ेगा।
एग्री–कमोडिटी पर असर
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| फसल | बासमती चावल |
| प्रमुख प्रभावित राज्य | पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश |
| मुख्य समस्याएं | ईरान में राजनीतिक अस्थिरता रियाल की गिरावट फॉरेक्स पेमेंट रिस्क अमेरिकी टैरिफ की धमकी |
| संभावित असर | निर्यात मांग में कमी मंडी भाव पर दबाव मिलर्स की खरीद में सुस्ती |
कमोडिटी विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यातक अब खाड़ी देशों, अफ्रीकी बाजार और यूरोप के प्रीमियम सेगमेंट पर फोकस बढ़ा सकते हैं, ताकि ईरान पर निर्भरता कम की जा सके।