चंडीगढ़ (कृषि भूमि ब्यूरो): पंजाब में एक बार फिर से किसान आंदोलन तेज हो गया है।विभिन्न लंबित मांगों और स्थानीय मुद्दों को लेकर किसान मजदूर मोर्चा (KMM) के बैनर तले किसानों और मजदूरों ने पंजाब सरकार के मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष के आवासों व कार्यालयों के बाहर जोरदार विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है।यह पांच दिवसीय राज्यव्यापी आंदोलन है, जिसमें बड़ी संख्या में किसान अपनी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ लंगर, दूध, और रोजमर्रा के अन्य जरूरी सामान लेकर पहुंचे हैं।
मंत्रियों और अध्यक्ष के आवासों पर डेरा
इस पांच दिवसीय धरने के तहत किसान मजदूर मोर्चा के प्रदर्शनकारियों ने चुनिंदा मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष के आवासों को मुख्य केंद्र बनाया है। किसान नेताओं का कहना है कि सरकार लंबे समय से उनकी जायज मांगों की अनदेखी कर रही है, जिसके चलते उन्हें यह कड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। ग्रामीण इलाकों से आए किसानों का यह जत्था शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों की मांग कर रहा है, लेकिन प्रशासन भी पूरी तरह मुस्तैद नजर आ रहा है।
किसान मजदूर मोर्चा की 12 सूत्रीय प्रमुख मांगें और मुद्दे
किसान नेता सरवन सिंह पंधेर और अन्य प्रमुख वक्ताओं ने स्पष्ट किया है कि सरकार के साथ कई दौर की बैठकों के बाद भी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। इस किसान मजदूर मोर्चा – Kisan Mazdoor Morcha protest Punjab – के दौरान मुख्य रूप से 12 सूत्रीय मांग पत्र उठाया गया है, जिसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
एमएसपी और फसल खरीद की गारंटी:बासमती धान, मक्का, मूंग, सरसों और आलू जैसी तमाम प्रमुख फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सरकारी खरीद कानून के दायरे में लाई जाए।
संपूर्ण कर्ज माफी:किसानों और कृषि मजदूरों का सारा कर्ज माफ किया जाए।इसके साथ ही, आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या करने वाले किसान-मजदूर परिवारों को उचित मुआवजा और उनके एक आश्रित को सरकारी नौकरी दी जाए।
बिजली और कृषि संकट का समाधान:राज्य में गहराते बिजली संकट से जल्द से जल्द निजात दिलाई जाए और किसानों पर प्रीपेड बिजली मीटर लगाने की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए।
केंद्रीय कानूनों और समझौतों का विरोध:बीज अधिनियम, सहकारी कानून, और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के प्रावधानों के विरोध में पंजाब विधानसभा में विशेष प्रस्ताव पारित किए जाएं।
अन्य प्रशासनिक मांगें:शंभू और खनौरी बॉर्डर आंदोलनों के दौरान जब्त किए गए वाहन व सामान वापस लौटाए जाएं, भूमि पूलिंग नीति रद्द हो, भारतमाला परियोजनाओं के तहत जबरन जमीन अधिग्रहण बंद हो, और पुराने आंदोलनों (पराली जलाने के मामलों सहित) के दौरान किसानों पर दर्ज किए गए मुकदमे वापस लिए जाएं।
सरकार के रुख पर सबकी नजरें और आगे की रणनीति
इस आंदोलन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव गहरे होते जा रहे हैं। प्रदर्शनकारी किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार अब भी संवेदनशीलता नहीं दिखाती है और बातचीत के जरिए समाधान नहीं निकालती है, तो आंदोलन को और अधिक आक्रामक रूप दिया जाएगा।
सरकार के रूख और आगे की रणनीति पर गहन विचार-विमर्श करने के लिए किसान मजदूर मोर्चा के नेताओं ने 16 सितंबर को एक अहम बैठक बुलाई है।इस बैठक में यह तय किया जाएगा कि यदि सरकार की तरफ से कोई सकारात्मक संदेश नहीं मिलता है, तो क्या हाईवे या रेलवे ट्रैक जाम जैसे कड़े कदम उठाए जाएं।फिलहाल, मंत्रियों के आवास के बाहर चल रहे इस प्रदर्शन ने सूबे की सियासत में हलचल तेज कर दी है।