चंडीगढ़, कृषि भूमि ब्यूरो। पंजाब खरीफ: जल संकट, गिरते भूजल स्तर और अल नीनो जैसी जलवायु चुनौतियों के बावजूद पंजाब में इस वर्ष खरीफ सीजन के दौरान धान की खेती ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। राज्य में धान का रकबा बढ़कर 32.76 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो अब तक का सबसे अधिक क्षेत्रफल माना जा रहा है। यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है जब राज्य और केंद्र सरकारें वर्षों से किसानों को धान-गेहूं के पारंपरिक चक्र से बाहर निकालकर फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि धान के लगातार बढ़ते रकबे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा नीतियां किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर आकर्षित करने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी हैं।
पंजाब खरीफ: कुल रकबे का 90 फीसदी से अधिक धान
पंजाब खरीफ: प्रदेश में खरीफ फसलों का कुल क्षेत्रफल करीब 36 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र केवल धान के अंतर्गत आ गया है। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य में फसल विविधीकरण की रफ्तार अभी भी बेहद धीमी है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि धान की सरकारी खरीद, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सुनिश्चित विपणन व्यवस्था किसानों को आर्थिक सुरक्षा देती है। यही कारण है कि अधिकांश किसान जोखिम उठाने के बजाय धान की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कपास समेत दूसरी फसलों का लगातार घट रहा रकबा
पंजाब खरीफ: धान के मुकाबले अन्य खरीफ फसलों की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। कभी पंजाब का मालवा क्षेत्र कपास उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता था, लेकिन पिछले एक दशक में कपास की खेती में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
वर्ष 2015 की तुलना में राज्य में कपास का रकबा लगभग 76 प्रतिशत घटकर 3.35 लाख हेक्टेयर से केवल 80 हजार हेक्टेयर रह गया है। विशेषज्ञ इसे किसानों के घटते भरोसे, कीट प्रकोप, उत्पादन जोखिम और बाजार की अनिश्चितता का परिणाम मानते हैं।
भूजल संकट और पर्यावरण पर बढ़ता दबाव
धान की खेती अधिक पानी की मांग वाली फसल मानी जाती है। ऐसे में पंजाब जैसे राज्य में, जहां अधिकांश सिंचाई भूजल पर निर्भर है, धान का बढ़ता रकबा चिंता का विषय बन गया है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड सहित कई संस्थाओं की रिपोर्टें पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि यदि वर्तमान स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में भूजल स्तर और तेजी से नीचे जा सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि भविष्य में किसानों को सिंचाई के लिए सैकड़ों फीट अधिक गहराई तक बोरिंग करनी पड़ सकती है, जिससे खेती की लागत भी बढ़ेगी और जल संकट भी गहराएगा।
आखिर किसान धान-गेहूं का चक्र क्यों नहीं छोड़ रहे?
कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण आर्थिक सुरक्षा है। धान और गेहूं दोनों फसलों के लिए किसानों को एमएसपी पर सरकारी खरीद की गारंटी मिलती है, जबकि मक्का, दलहन, तिलहन और कपास जैसी वैकल्पिक फसलों में ऐसी स्थिर व्यवस्था नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक किसानों को दूसरी फसलों में धान जितनी आय, समय पर खरीद और बाजार की सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक फसल विविधीकरण की योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं देंगी।
सरकार की रणनीति: बासमती और डीएसआर तकनीक पर जोर
राज्य सरकार धान की खेती को अपेक्षाकृत कम जल-खपत वाली दिशा में ले जाने का प्रयास कर रही है। इसके तहत बासमती धान के रकबे को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि इसकी कई किस्में सामान्य धान की तुलना में कम अवधि में तैयार होती हैं और अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता होती है।
इसके अलावा डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक पारंपरिक रोपाई की तुलना में पानी की बचत करने में मददगार हो सकती है, हालांकि इसका व्यापक और सफल उपयोग स्थानीय परिस्थितियों तथा किसानों के प्रशिक्षण पर निर्भर करेगा।

सुरक्षित बाजार के बिना नहीं बढ़ेगा फसल विविधीकरण
कृषि विशेषज्ञों और राज्य सरकार के अधिकारियों का मानना है कि केवल प्रोत्साहन योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। यदि सरकार वास्तव में धान का रकबा कम करना चाहती है, तो मक्का, दलहन, तिलहन और अन्य वैकल्पिक फसलों के लिए सुनिश्चित खरीद, लाभकारी मूल्य और मजबूत बाजार व्यवस्था विकसित करनी होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों के लिए फसल चयन का सबसे बड़ा आधार लाभ और जोखिम होता है। जब तक वैकल्पिक फसलें आर्थिक रूप से धान के बराबर आकर्षक नहीं बनेंगी, तब तक पंजाब में धान-गेहूं का चक्र तोड़ना आसान नहीं होगा।
पंजाब खरीफ: पंजाब में इस वर्ष धान के रिकॉर्ड रकबे ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि जल संरक्षण, भूजल प्रबंधन और फसल विविधीकरण को लेकर नीतियों की प्रभावशीलता पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही नहीं, बल्कि संसाधनों के संतुलित उपयोग और किसानों की आय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना भी सबसे बड़ी चुनौती होगी।
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