नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): 100% अतिरिक्त टैरिफ का खतरा बढ़ा: अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट ने रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ कड़े व्यापारिक कदम उठाने वाले एक महत्वपूर्ण विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। 7 अगस्त को 86-11 मतों से पारित इस विधेयक के तहत अमेरिका के राष्ट्रपति को ऐसे देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिलेगा, जो कानून लागू होने के 30 दिन बाद भी रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखते हैं।
भारत, जो रूसी कच्चे तेल का प्रमुख आयातक है, इस प्रस्तावित कानून के दायरे में आने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। हालांकि, यह कानून अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है और इसके प्रभावी होने से पहले कई संवैधानिक प्रक्रियाएं पूरी होना बाकी हैं।
अभी क्या है विधेयक की स्थिति?
सीनेट से पारित होने के बाद यह विधेयक अब दोबारा प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) में जाएगा, जहां 31 अगस्त को प्रस्तावित बैठक में इस पर विचार किया जाएगा। प्रतिनिधि सभा इसे मौजूदा स्वरूप में मंजूर कर सकती है, संशोधन कर सकती है या पूरी तरह खारिज भी कर सकती है।
यदि प्रतिनिधि सभा इसमें बदलाव करती है तो दोनों सदनों को एक समान मसौदे पर सहमति बनानी होगी। इसके बाद ही विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा।
हालांकि व्हाइट हाउस ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है और संकेत दिया है कि राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, लेकिन प्रतिनिधि सभा में इसके पारित होने को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। कुछ सांसदों का मानना है कि इससे राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की अत्यधिक शक्तियां मिल सकती हैं और अमेरिकी कंपनियों तथा उपभोक्ताओं की लागत बढ़ सकती है।
किस आधार पर लगेगा 100% तक अतिरिक्त टैरिफ?
यह विधेयक भारत पर स्वतः 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं करता। इसकी धारा 113 राष्ट्रपति को यह अधिकार देती है कि वे उन देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगा सकें जो कानून लागू होने के 30 दिन बाद भी रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीद रहे हों और रूसी ऊर्जा के पांच सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हों।
विधेयक के समर्थकों ने चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान को रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदारों के रूप में सूचीबद्ध किया है।
ये अतिरिक्त शुल्क पहले से लागू अमेरिकी व्यापार शुल्कों के अतिरिक्त होंगे। इनमें धारा 301, धारा 232, एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी भी शामिल हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) किसी देश द्वारा रूसी ऊर्जा की खरीद बढ़ाने या घटाने के आधार पर टैरिफ दरों में बदलाव कर सकेगा।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, यह प्रस्ताव भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक चुनौती बन सकता है।
GTRI का कहना है कि यद्यपि चीन भारत से अधिक रूसी तेल खरीदता है, फिर भी अमेरिका की ओर से भारत पर अधिक दबाव डाला जा सकता है। संस्था ने यह भी याद दिलाया कि जुलाई 2025 में अमेरिका ने रूस से जुड़े मुद्दे पर भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, जिसे फरवरी 2026 में वापस लिया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विधेयक राष्ट्रपति को देश-विशिष्ट व्यापारिक कार्रवाई करने का व्यापक अधिकार देता है, जिससे भारत पर दबाव बढ़ सकता है।
रूसी तेल क्यों महत्वपूर्ण है?
वित्त वर्ष 2025-26 में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा। इस अवधि में भारत ने कुल 134.7 अरब डॉलर के कच्चे तेल का आयात किया, जिसमें 40.8 अरब डॉलर यानी 30.3 प्रतिशत हिस्सेदारी रूस की रही।
रियायती कीमतों पर मिलने वाले रूसी तेल ने भारत के आयात बिल को कम रखने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और घरेलू महंगाई को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि भारत दबाव में आकर रूसी तेल की खरीद कम करता है तो ऊर्जा लागत बढ़ने का सीधा असर उद्योगों, परिवहन और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
अमेरिका से भी बढ़ रही है ऊर्जा खरीद
भारत ने हाल के वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा आयात भी लगातार बढ़ाया है। वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिका से कच्चे तेल का आयात 6.6 अरब डॉलर से बढ़कर 9.1 अरब डॉलर हो गया। कुल अमेरिकी ऊर्जा आयात 12.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें 1.4 अरब डॉलर का एलएनजी, 896 मिलियन डॉलर का एलपीजी और 861 मिलियन डॉलर का पेट्रो कोक शामिल है।
यह दर्शाता है कि भारत ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है।
व्यापार और विदेश नीति का नया समीकरण
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका अब व्यापारिक उपायों का उपयोग विदेश नीति के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अधिक आक्रामक तरीके से कर रहा है। रेसिप्रोकल टैरिफ, धारा 301 की जांच, जबरन श्रम से जुड़े प्रतिबंध, क्षेत्र-विशेष शुल्क और अब रूसी ऊर्जा से जुड़े प्रस्ताव इस रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
GTRI का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति केवल टैरिफ के दबाव में नहीं बदलनी चाहिए। संस्था के अनुसार, जब तक रूसी कच्चा तेल आर्थिक रूप से लाभकारी बना हुआ है, भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही, अमेरिका के साथ उत्पन्न मतभेदों का समाधान कूटनीतिक बातचीत और संतुलित व्यापार वार्ता के माध्यम से किया जाना चाहिए, ताकि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा दोनों सुरक्षित रह सकें।

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