[polylang_langswitcher]

Soil Health: लोकसभा में सरकार का खुलासा: पंजाब में धान-गेहूं की लगातार खेती से बिगड़ रही मिट्टी

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो)। Soil Health: पंजाब में लगातार धान और गेहूं की खेती से मिट्टी की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने लोकसभा में यह जानकारी देते हुए कहा कि राज्य में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना समय की जरूरत है।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के एक अध्ययन का हवाला देते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी ने मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट के प्रमुख कारणों और उसके सुधार के उपायों की जानकारी दी। इसके साथ ही सरकार ने जल संकट वाले क्षेत्रों में अधिक पानी वाली फसलों, 10,000 किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) योजना और जीआई टैग वाली कॉफी के निर्यात से जुड़े ताजा आंकड़े भी सदन में पेश किए।

Soil Health: लगातार धान-गेहूं की खेती से बिगड़ रही मिट्टी

सरकार के अनुसार, पंजाब में वर्षों से धान-गेहूं फसल चक्र पर अत्यधिक निर्भरता के कारण मिट्टी की भौतिक संरचना प्रभावित हो रही है। मंत्री ने बताया कि खेतों में बार-बार पानी भरकर जुताई (पडलिंग), गहरी जुताई तथा हरी खाद और दलहनी फसलों की अनदेखी मिट्टी की गुणवत्ता (soil health) को कमजोर कर रही है।

पडलिंग के कारण मिट्टी के प्राकृतिक छिद्र कम हो जाते हैं और जमीन की निचली परत कठोर बन जाती है। इससे पानी का प्रवाह, जड़ों का विकास और मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर कृषि उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है।

Soil Healthवैज्ञानिक उपायों से सुधर सकती है मिट्टी की सेहत

केंद्र सरकार ने कहा कि मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार के लिए वैज्ञानिक खेती अपनाना जरूरी है। इसके तहत किसानों को फसल चक्र अपनाने, दलहनी फसलों की खेती बढ़ाने, जैविक खाद का उपयोग करने तथा संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह दी गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान धान-गेहूं के पारंपरिक चक्र से निकलकर मक्का, दालें, तिलहन और अन्य फसलों को अपनाते हैं तो मिट्टी की उर्वरता (soil health) के साथ-साथ जल संरक्षण में भी मदद मिलेगी।

धान का रकबा बढ़ा, वैकल्पिक फसलों का हिस्सा घटा

Soil Health: लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में वर्ष 2021-22 में धान का रकबा 29.69 लाख हेक्टेयर था, जो 2025-26 में बढ़कर 32.68 लाख हेक्टेयर हो गया। वहीं, गेहूं का रकबा 35.25 लाख हेक्टेयर से मामूली घटकर 34.58 लाख हेक्टेयर रह गया।

चिंताजनक तथ्य यह है कि मक्का, दलहन और तिलहन जैसी वैकल्पिक फसलों का हिस्सा 8.6 प्रतिशत से घटकर 6.2 प्रतिशत रह गया है। हालांकि, बागवानी क्षेत्र में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। फल और सब्जियों का हिस्सा 6.3 प्रतिशत से बढ़कर 7.2 प्रतिशत हो गया है, जो संकेत देता है कि कुछ किसान धीरे-धीरे बागवानी की ओर भी रुख कर रहे हैं।

कम बारिश वाले क्षेत्रों में पानी ज्यादा मांगने वाली फसलें

जल संरक्षण से जुड़े एक अन्य प्रश्न के जवाब में कृषि राज्य मंत्री ने बताया कि देश में धान, गन्ना, कपास और जूट सबसे अधिक पानी की खपत करने वाली फसलें हैं। ये फसलें देश के कुल बोए गए क्षेत्र के लगभग 62.7 मिलियन हेक्टेयर, यानी करीब एक-तिहाई हिस्से में उगाई जाती हैं।

आईसीएआर के आकलन के अनुसार, 68 ऐसे जिले, जहां वार्षिक वर्षा 650 मिमी से कम होती है, वहां 2.89 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती हो रही है, जो देश के कुल धान क्षेत्र का 5.67 प्रतिशत है। इसी प्रकार 700 मिमी से कम वर्षा वाले 91 जिलों में 0.721 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती की जा रही है, जो कुल गन्ना क्षेत्र का 10.76 प्रतिशत है।

सरकार का कहना है कि इन आंकड़ों के आधार पर जल संकट वाले इलाकों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जाएगा ताकि पानी की बचत के साथ किसानों की आय भी सुरक्षित रह सके।

10,000 एफपीओ योजना का दायरा बढ़ा

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में बताया कि केंद्र सरकार की 10,000 किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) योजना के तहत अब तक सभी 10,000 एफपीओ गठित किए जा चुके हैं। इनसे 65 लाख से अधिक छोटे और सीमांत किसान जुड़े हैं।

वित्त वर्ष 2024-25 के अनुसार, 6,964 एफपीओ का वार्षिक कारोबार 50 लाख रुपये तक रहा, जबकि 862 एफपीओ का कारोबार 50 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच दर्ज किया गया। वहीं, 1,135 एफपीओ ने 1 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार किया।

सरकार के मुताबिक, 6,928 एफपीओ के पास बीज लाइसेंस, 4,987 के पास कीटनाशक बिक्री लाइसेंस और 6,650 के पास उर्वरक बिक्री का लाइसेंस है। इसके अलावा 5,765 एफपीओ अपनी प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) इकाइयां भी स्थापित कर चुके हैं, जिससे किसानों को मूल्य संवर्धन का लाभ मिल रहा है।

Soil Health
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए ‘कृषि भूमि’ के व्हाट्सएप्प चैनल से जुड़ें

जीआई टैग वाली कॉफी के निर्यात को मिला बढ़ावा

वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने सदन में बताया कि केंद्र सरकार और कॉफी बोर्ड द्वारा जीआई टैग वाली कॉफी उत्पादक किसानों को लगातार सहयोग दिया जा रहा है। इसका सकारात्मक असर निर्यात पर भी दिखाई दिया है।

सरकार के अनुसार, 2025-26 में जीआई-रजिस्टर्ड अरेबिका कॉफी के औसत निर्यात मूल्य में 34.36 प्रतिशत तथा रोबस्टा कॉफी के औसत निर्यात मूल्य में 29.73 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इससे देश के कॉफी उत्पादकों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ी है।

फसल विविधीकरण ही दीर्घकालिक समाधान

Soil Health: लोकसभा में पेश किए गए आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि पंजाब सहित कई राज्यों में धान और गेहूं पर अत्यधिक निर्भरता मिट्टी और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। किसानों को वैकल्पिक फसलों के लिए लाभकारी मूल्य, सुनिश्चित खरीद, मजबूत बाजार और तकनीकी सहायता उपलब्ध करानी होगी। तभी फसल विविधीकरण को गति मिलेगी और कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकेगा।

====

इन ख़बरों को भी पढ़ें…

Success Story: बस्तर की ग्रेसी दुग्गा ने आधुनिक सूकरपालन से रची आत्मनिर्भरता की नई कहानी

कच्चे जूट के दाम आधे हुए, महज तीन हफ्तों में ₹9000 की बड़ी गिरावट; जूट मिलों ने उठाए सवाल

हल्दी बाजार: कीमतों में जोरदार तेजी; किसानों ने बढ़ाया रकबा, मानसून तय करेगा बाजार की दिशा

इलायची निर्यात धीमा: ऊंचे दाम और कमजोर मानसून से उत्पादन घटने की आशंका

मध्य प्रदेश के किसानों ने खत्म किया आंदोलन, राज्य सरकार ने मानी मांगें

खाद संकट से बचने के लिए संसदीय समिति ने सरकार को दी सलाह

भारत का इलायची निर्यात तीन गुना बढ़कर 43.68 करोड़ डॉलर

शेयर :

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp

संबंधित श्रेणी न्यूज़

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें

ताज़ा न्यूज़

विज्ञापन

विशेष न्यूज़

Stay with us!

Subscribe to our newsletter and get notification to stay update.

राज्यों की सूची