मुंबई, 13 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): महाराष्ट्र में ज्वार या ज्वारी सिर्फ एक अनाज नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, भोजन संस्कृति और जलवायु अनुकूल खेती का प्रतीक रही है। इसे लंबे समय से “दक्कन की जीवनरेखा” कहा जाता है, लेकिन मौजूदा रबी सीज़न के आंकड़े इस पारंपरिक फसल के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं।
राज्य कृषि विभाग के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इस सीज़न में ज्वार की बुवाई का रकबा औसतन 14.95 लाख हेक्टेयर से घटकर 12.66 लाख हेक्टेयर रह गया है। यानी लगभग 2 लाख हेक्टेयर की सीधी गिरावट दर्ज की गई है।
प्रमुख ज्वार उत्पादक जिले सबसे ज्यादा प्रभावित
महाराष्ट्र के ज्वार उत्पादन में अहम भूमिका निभाने वाले सोलापुर, अहमदनगर और धाराशिव इस गिरावट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। ये तीनों जिले मिलकर राज्य के कुल ज्वार उत्पादन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा देते हैं।
इन इलाकों में मॉनसून के दौरान हालात बेहद ख़राब रहे। कई स्थानों पर बारिश सामान्य से 200 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई, जिससे खेत लंबे समय तक जलभराव की स्थिति में रहे। नतीजतन, मॉनसून खत्म होने के बाद भी जमीन खेती के लायक नहीं बन पाई और रबी बुवाई की समय-सीमा निकल गई।
जिलावार ज्वार बुवाई में गिरावट
| जिला | ज्वार बुवाई में कमी (हेक्टेयर) |
|---|---|
| सोलापुर | 1.67 लाख |
| अहमदनगर | 1.46 लाख |
| धाराशिव | 1.30 लाख |
सिर्फ सोलापुर जिले में ही ज्वार के रकबे में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
किसानों को फसल बदलने पर होना पड़ा मजबूर
सोलापुर जिले के किसान बताते हैं कि भारी बारिश ने उन्हें फसल बदलने पर मजबूर कर दिया। बारिश से जहां खेत पूरी तरह खराब हो गए, वहां किसानों ने ज्वार छोड़कर करडई (कुसुम) बोए। हालाँकि, जिन खेतों में ज्वार की बुआई देर से हुई, वहां पैदावार को लेकर डर बना हुआ है।
मालदंडी ज्वारी पर भी संकट
मंगलवेढ़ा इलाका मालदंडी ज्वारी के लिए मशहूर है, जिसे GI टैग प्राप्त है। यह किस्म अपनी नरम भाकरी और खास स्वाद के लिए जानी जाती है, खासकर पिटला और ठेचा के साथ।
मालदंडी को पूरी तरह पकने और पोषण मूल्य पाने में लगभग साढ़े चार महीने लगते हैं। लेकिन खेतों में पानी भरे रहने से शुरुआती 1–2 महीने बर्बाद हो गए। यही वजह है कि कई किसानों ने इस बार ज्वार की जगह गेहूं, मक्का और चना जैसी फसलों को प्राथमिकता दी।
रबी फसलों का रुझान बदला
पूरे राज्य के आंकड़े बताते हैं कि ज्वार का रकबा घटने के साथ-साथ दूसरी फसलों की बुवाई बढ़ी है।
| फसल | बुवाई में बढ़ोतरी (हेक्टेयर) |
|---|---|
| गेहूं | 43,000 |
| मक्का | 1.65 लाख |
| चना | 1.24 लाख |
सिर्फ प्रमुख ज्वार उत्पादक जिलों में ही करीब 80,000 हेक्टेयर जमीन दूसरी रबी फसलों के तहत चली गई।
उत्पादन घटा, कीमतों में तेजी शुरू
कम उत्पादन का असर अब बाजार में दिखने लगा है। कोल्हापुर के अनाज व्यापारी सदानंद कोरगांवकर के अनुसार, पिछले दो महीनों में ज्वार की थोक कीमतों में तेज उछाल आया है।
उनके मुताबिक, “थोक कीमतें करीब 7 रुपये प्रति किलो बढ़कर अब 55 से 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं, जबकि खुदरा कीमतें 70 रुपये प्रति किलो के आसपास चल रही हैं।”
उन्होंने बताया कि कोल्हापुर में आने वाला ज्यादातर ज्वार सोलापुर के बार्शी बाजार से आता है और इस सीज़न में कम आवक के चलते कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है।
बढ़ती मांग और घटती आपूर्ति की चुनौती
ज्वार के सफेद, गोल दानों को उनकी बेहतर भाकरी गुणवत्ता और पोषण के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र के लगभग आधे घरों में रोज़ कम से कम एक वक्त भाकरी खाई जाती है। साथ ही मोटे अनाजों के स्वास्थ्य लाभों को लेकर बढ़ती जागरूकता ने ज्वार की मांग को और मजबूत किया है—जैसे गुजरात में बाजरा और कर्नाटक में रागी की मांग बढ़ी है।
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