मुंबई, 26 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कार 2026 की घोषणा कर दी है। इस वर्ष कुल 131 व्यक्तित्वों को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा जाएगा, जिनमें 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्मश्री शामिल हैं। इस सूची में कृषि क्षेत्र से एक ऐसा नाम शामिल है, जिसने प्रयोगशाला नहीं बल्कि खेत को अपनी शोधशाला बनाया—महाराष्ट्र के परभणी जिले के प्रगतिशील किसान श्रीरंग देवबा लाड, जिन्हें देशभर में ‘दादा लाड’ और ‘कृषि ऋषि’ के नाम से जाना जाता है।
कपास नवाचार के लिए राष्ट्रीय सम्मान
79 वर्षीय दादा लाड को कपास खेती में व्यावहारिक नवाचार, उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय में सुधार के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह सम्मान ‘अनसंग हीरोज’ श्रेणी में मिला है, जो उन जमीनी बदलाव लाने वालों को पहचान देता है, जिनका योगदान व्यापक असर डालता है लेकिन अक्सर सुर्खियों से दूर रहता है।
कौन हैं दादा लाड
परभणी जिले के मलसोना गांव में जन्मे दादा लाड किसान परिवार से आते हैं। प्रारंभिक शिक्षा और स्नातक अध्ययन के बाद उन्होंने खेती को ही अपना अनुसंधान क्षेत्र बनाया। वर्षों के अनुभव, निरंतर प्रयोग और खेत-स्तरीय परीक्षणों के आधार पर उन्होंने ऐसी तकनीकें विकसित कीं, जो छोटे और मध्यम किसानों के लिए भी व्यावहारिक रहीं।
‘दादा लाड तकनीक’ क्या है
दादा लाड की पहचान उनकी “दादा लाड कपास खेती तकनीक” से बनी, जिसमें
- फसल घनत्व का संतुलन
- मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता पर फोकस
- सिंचाई और पोषण प्रबंधन का स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयोग
- रासायनिक निर्भरता कम कर लागत घटाने पर जोर
इन उपायों के संयुक्त प्रभाव से कई क्षेत्रों में कपास की पैदावार में 2 से 3 गुना तक वृद्धि दर्ज की गई।
ज्वार और अन्य फसलों में भी असर
उनका काम केवल कपास तक सीमित नहीं रहा। कर्नाटक के इंडी क्षेत्र सहित कई स्थानों पर ज्वार की खेती में उनके तरीकों को अपनाने से प्रति एकड़ उत्पादन 5–6 क्विंटल से बढ़कर लगभग 25–28 क्विंटल तक पहुंचा। इससे किसानों की शुद्ध आय में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
पुरस्कार पर दादा लाड की प्रतिक्रिया
पद्मश्री सम्मान पर प्रतिक्रिया देते हुए दादा लाड ने कहा कि यह पुरस्कार उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि से ज्यादा किसानों के प्रति जिम्मेदारी है। उनके अनुसार, “अगर मेरा अनुभव और तकनीक ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचे और वे अपनी फसल की पैदावार बढ़ा सकें, तो वही इस सम्मान की असली सार्थकता होगी।”
पहले भी मिल चुकी है अकादमिक पहचान
कृषि क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए वसंतराव नाइक मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, परभणी ने हाल ही में उन्हें मानद डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया था। यह सम्मान विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में प्रदान किया गया, जिसने उनके जमीनी नवाचार को अकादमिक मान्यता भी दी।
दादा लाड भारतीय किसान संघ से जुड़े रहे हैं और वर्तमान में गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात क्षेत्रों में संगठनात्मक दायित्व निभा चुके हैं। उन्होंने किसान प्रशिक्षण, खेत-स्तरीय प्रयोग और अनुभव साझा करने की परंपरा को मजबूत किया।
क्यों खास है यह सम्मान
पद्मश्री से सम्मानित दादा लाड की कहानी यह दिखाती है कि खेती में नवाचार केवल लैब से नहीं, खेत से भी निकल सकता है। उनकी सफलता देश के उन लाखों किसानों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बदलाव की ताकत रखते हैं।
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