भारत के जीरा निर्यात पर संकट के बादल: चीन, बांग्लादेश में कमजोर मांग से निर्यात पर 20% तक गिरावट का खतरा!

मुंबई, 29 नवम्बर, 2025 (कृषि भूमि डेस्क): जीरा, जिसे मसालों का राजा कहा जाता है, भारत के लिए केवल एक मसाला नहीं है, बल्कि विदेशी मुद्रा कमाने का एक महत्वपूर्ण जरिया भी है। भारत दुनिया में जीरे (Cumin) का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक रहा है, लेकिन अब इस सुनहरी फसल के निर्यात पर गहरे संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसका मुख्य कारण चीन में जीरे का बढ़ता उत्पादन और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कम कीमतें हैं।

चीन की बढ़ती ‘जीरा’ शक्ति

हाल के वर्षों में, चीन ने जीरे की खेती में बड़ा निवेश किया है और इसकी उपज में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। चीन में जीरे की फसल की गुणवत्ता अच्छी बताई जा रही है, और सबसे बड़ी बात यह है कि वह भारतीय जीरे  की तुलना में काफी कम कीमत पर इसे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेच रहा है। चीन में जीरे की खेती में लागत कम आने के कारण, वे निर्यात मूल्य को कम रख पा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय खरीदार, जैसे कि मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश, अब सस्ते चीनी जीरे की ओर रुख कर रहे हैं। प्रमुख खरीदारों की ओर से मांग कम होने के कारण भारतीय निर्यातकों पर भारी दबाव पड़ रहा है।

भारतीय निर्यात पर गहराती चिंता

इस प्रतिस्पर्धा का सीधा और नकारात्मक असर भारतीय जीरा निर्यात पर पड़ रहा है। अनुमान है कि चालू वर्ष में भारत के जीरा निर्यात में 20% तक की भारी गिरावट आ सकती है।

  • मूल्य युद्ध: भारतीय निर्यातकों के लिए चीनी जीरे से प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो रहा है, जिससे उन्हें अपनी कीमतों में कटौती करनी पड़ रही है।

  • घटता निर्यात: अप्रैल से जून 2025 के दौरान भारत से जीरा निर्यात में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 19.57% की गिरावट देखी गई है, जो इस खतरे की गंभीरता को दर्शाता है।

  • किसानों पर असर: निर्यात में कमी और कीमतों में गिरावट का सीधा असर भारत के गुजरात और राजस्थान जैसे प्रमुख जीरा उत्पादक राज्यों के किसानों पर पड़ेगा, जिनकी आय जीरे की फसल पर निर्भर करती है।

चुनौती से निपटने का रास्ता?

इस चुनौती से निपटने के लिए भारत को तुरंत कुछ कदम उठाने की जरूरत है:

  1. उत्पादकता बढ़ाना: किसानों को उन्नत बीज और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराकर प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ानी चाहिए ताकि उत्पादन लागत कम हो सके।

  2. गुणवत्ता और ब्रांडिंग: भारतीय जीरे की बेहतर गुणवत्ता पर ज़ोर देते हुए, इसे एक प्रीमियम उत्पाद के रूप में वैश्विक स्तर पर ब्रांड करने की आवश्यकता है।

  3. नए बाजार तलाशना: पारंपरिक खरीदारों से इतर, नए अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में पैठ बनाने की रणनीति पर काम करना होगा।

  4. सरकारी समर्थन: निर्यातकों को सरकारी सब्सिडी या प्रोत्साहन देकर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने में मदद की जा सकती है।

जीरा भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। चीनी प्रतिस्पर्धा को हल्के में नहीं लिया जा सकता। सरकार और उद्योग को मिलकर ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिससे भारतीय जीरा अपनी वैश्विक चमक बरकरार रख सके।

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