नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): देश के कृषि जिंस बाजार में इस समय कीमतों में तेजी और उत्पादन संबंधी चुनौतियां एक साथ दिखाई दे रही हैं। सोयाबीन, तुअर, चना और सरसों जैसी प्रमुख फसलों के भाव पिछले साल के मुकाबले ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं। कुछ जिंसों में कीमतों की बढ़ोतरी 50 फीसदी से भी अधिक बताई जा रही है। दूसरी ओर, कमजोर मानसून और मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होने के कारण रबी फसलों की बुआई की रफ्तार धीमी पड़ गई है। इसका असर आने वाले महीनों में कृषि उत्पादन, किसानों की आमदनी और खाद्य तेल एवं दलहन बाजार पर पड़ सकता है।
मंडी कारोबार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, सोयाबीन की कीमतों में करीब 55 फीसदी तक की सालाना तेजी दर्ज की गई है। तुअर के भाव भी पिछले साल की तुलना में लगभग 50 फीसदी ऊपर बताए जा रहे हैं। हालांकि, अलग-अलग मंडियों में आवक, गुणवत्ता और स्थानीय मांग के कारण वास्तविक भाव में अंतर बना हुआ है।
सोयाबीन का भाव एमएसपी से ऊपर
सोयाबीन के बाजार भाव में तेजी किसानों के लिए राहत की खबर लेकर आई है। मंडियों में सोयाबीन का भाव करीब 7,000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास पहुंच गया है, जबकि खरीफ विपणन सीजन 2026-27 के लिए इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 5,708 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है। यानी कई मंडियों में किसानों को सरकारी समर्थन मूल्य से अधिक भाव मिल रहा है।
सरकारी एगमार्कनेट के आंकड़ों पर आधारित बाजार रिपोर्ट के अनुसार, 6 नवंबर को देश की प्रमुख मंडियों में सोयाबीन का औसत मॉडल भाव लगभग 6,700 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास रहा। हालांकि, मंडी और गुणवत्ता के अनुसार कीमतों में अंतर देखा गया। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में सोयाबीन की कीमतों पर खास नजर बनी हुई है।
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के शुरुआती अनुमान के मुताबिक, खरीफ 2026 में देश का सोयाबीन उत्पादन 107.93 लाख टन रह सकता है। यह पिछले साल के 110.26 लाख टन के मुकाबले करीब 2.1 फीसदी कम है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना में मौसम संबंधी प्रतिकूल परिस्थितियों ने उत्पादन को प्रभावित किया है।
तुअर और चना की कीमतों में भी तेजी
दलहन बाजार में भी कीमतों का रुख मजबूत बना हुआ है। तुअर का भाव करीब 10,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचने की जानकारी है। कारोबारियों के मुताबिक, पिछले साल के मुकाबले इसमें लगभग 50 फीसदी की तेजी आई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों से पैदावार प्रभावित होने की आशंका ने बाजार में कीमतों को सहारा दिया है।
इसी तरह चना भी पिछले साल की तुलना में करीब 14 फीसदी महंगा होकर लगभग 7,400 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गया है। चना देश में दलहन आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी कीमतों में तेजी का असर दालों के बाजार और उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर भी पड़ सकता है।
सरसों और गेहूं के भाव में भी बढ़ोतरी
तिलहन और खाद्यान्न बाजार में भी तेजी का रुख बना हुआ है। राजस्थान की मंडियों में पुरानी सरसों 7,200 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक के भाव पर बिक रही है। इसके मुकाबले आगामी सीजन के लिए सरसों का एमएसपी 6,613 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है।
वहीं, दिल्ली में गेहूं का भाव करीब 2,850 रुपये प्रति क्विंटल बताया जा रहा है, जो पिछले साल की समान अवधि से लगभग 5 फीसदी अधिक है। गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच बाजार की नजर नई फसल की बुआई और आगामी उत्पादन पर टिकी है।
रबी की बुआई 46 फीसदी पीछे, उत्पादन पर चिंता
कीमतों में तेजी के बीच कृषि क्षेत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती रबी फसलों की बुआई की धीमी रफ्तार है। कमजोर मानसून के कारण कई क्षेत्रों में मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं बची है। इससे किसान गेहूं, चना और सरसों जैसी फसलों की बुआई समय पर नहीं कर पा रहे हैं।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 30 अक्टूबर 2026 तक देश में रबी फसलों की बुआई 37.56 लाख हेक्टेयर में हुई थी। पिछले साल इसी अवधि में यह क्षेत्र 69.02 लाख हेक्टेयर था। इस तरह बुआई का कुल रकबा करीब 46 फीसदी कम रहा। गेहूं की बुआई भी काफी पीछे है। इस अवधि तक गेहूं का रकबा महज 19 हजार हेक्टेयर दर्ज किया गया, जबकि पिछले साल यह 3.34 लाख हेक्टेयर था।
इस स्थिति का असर आगे चलकर रबी फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है। यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश या सिंचाई की सुविधा से मिट्टी में नमी की स्थिति नहीं सुधरती, तो किसानों को फसल चयन और बुआई की रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
बाजार में तेजी, लेकिन किसानों के सामने दोहरी चुनौती
कृषि जिंसों की बढ़ती कीमतें उन किसानों को बेहतर बाजार भाव दे सकती हैं जिनके पास बेचने के लिए पर्याप्त उपज उपलब्ध है। लेकिन कमजोर मानसून, संभावित उत्पादन गिरावट और खेती की बढ़ती लागत के कारण सभी किसानों को इसका समान लाभ मिलना तय नहीं है।
आने वाले दिनों में रबी की बुआई की गति, मौसम की स्थिति, मंडियों में नई आवक और सरकारी खरीद की व्यवस्था कृषि बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे। ऐसे में मौजूदा तेजी के बावजूद किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों के लिए आगामी कृषि सीजन महत्वपूर्ण रहने वाला है।
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