चावल की बढ़ती कीमतों पर केंद्र का बड़ा एक्शन, बिक्री का लक्ष्य दोगुना; जमाखोरी रोकने के लिए हर शुक्रवार देना होगा स्टॉक का ब्योरा
खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 6 नवंबर को इन फैसलों की घोषणा की। सरकार का कहना है कि इन कदमों का उद्देश्य घरेलू बाजार में चावल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना, कीमतों को स्थिर रखना और जमाखोरी तथा कालाबाजारी को रोकना है।
सात महीने में 25 लाख टन चावल की बिक्री
सरकार के मुताबिक, खुले बाजार बिक्री योजना (OMSS-D) के तहत अप्रैल से 31 अक्टूबर 2026 के बीच ई-नीलामी के जरिए निजी कारोबारियों को 25 लाख टन चावल बेचा जा चुका है। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह बिक्री करीब 11 लाख टन थी। यानी सरकारी ई-नीलामी के माध्यम से बाजार में चावल की आपूर्ति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
बिक्री में तेजी और बाजार में कीमतों के दबाव को देखते हुए सरकार ने अब पूरे वित्त वर्ष के लिए बिक्री का लक्ष्य 50 लाख टन कर दिया है। इस व्यवस्था के तहत भारतीय खाद्य निगम (FCI) के भंडार से चावल खुले बाजार में उपलब्ध कराया जाता है, ताकि निजी कारोबारी इसे खरीदकर बाजार में बेच सकें। सरकार को उम्मीद है कि अतिरिक्त आपूर्ति से कीमतों में नरमी लाने में मदद मिलेगी।
एक साल में 12 फीसदी महंगा हुआ चावल
सरकार के लिए चावल की कीमतों में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनी हुई है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के मूल्य निगरानी प्रकोष्ठ के आंकड़ों के अनुसार, 30 अक्टूबर 2026 को देश में चावल की औसत खुदरा कीमत करीब 48.23 रुपये प्रति किलो रही। यह एक साल पहले के मुकाबले लगभग 12 फीसदी अधिक है।
वहीं, सितंबर 2026 में चावल की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 8.25 फीसदी हो गई, जबकि अगस्त में यह 5.89 फीसदी थी। खासकर प्रीमियम गैर-बासमती चावल की कुछ किस्मों के दाम में तेज उछाल देखा गया है। दक्षिण भारत में लोकप्रिय सोना मसूरी चावल का थोक भाव करीब 65 से 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की खबर है, जो एक महीने पहले लगभग 50 रुपये प्रति किलो था।
इसका असर आम उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर पड़ रहा है। चावल देश के बड़े हिस्से में प्रमुख खाद्य पदार्थ है। ऐसे में इसकी कीमतों में लगातार बढ़ोतरी खाद्य महंगाई को भी प्रभावित कर सकती है।
भारत राइस की बिक्री बढ़ाने की तैयारी
आम उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर चावल उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने ‘भारत राइस’ की आपूर्ति बढ़ाने का भी फैसला किया है। इसके तहत नेफेड (NAFED), राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ (NCCF) और केंद्रीय भंडार को अतिरिक्त चावल आवंटित किया जाएगा।
इन संस्थाओं को देशभर में, विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों में भारत राइस की बिक्री बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही वितरण के नए माध्यम तलाशने को कहा गया है, ताकि अधिक से अधिक उपभोक्ताओं तक रियायती दरों पर चावल पहुंचाया जा सके।
सरकार की रणनीति है कि खुले बाजार में सामान्य चावल की आपूर्ति बढ़ाने के साथ-साथ भारत राइस के माध्यम से उपभोक्ताओं को एक किफायती विकल्प भी उपलब्ध कराया जाए।
हर शुक्रवार देना होगा स्टॉक का हिसाब
चावल की जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने देशभर में स्टॉक निगरानी व्यवस्था सख्त कर दी है। 6 नवंबर के आदेश के मुताबिक, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चावल और धान का भंडारण करने वाले व्यापारियों, थोक विक्रेताओं, खुदरा कारोबारियों, बड़ी रिटेल चेन और प्रोसेसरों तथा राइस मिलों को अपने स्टॉक की जानकारी हर शुक्रवार ऑनलाइन देनी होगी।
इसके लिए खाद्य स्टॉक पोर्टल पर पंजीकरण और नियमित अपडेट अनिवार्य किया गया है। कारोबारियों को छह श्रेणियों में स्टॉक का ब्योरा देना होगा। इनमें बासमती चावल, प्रीमियम गैर-बासमती चावल, सामान्य गैर-बासमती चावल, उसना चावल, टूटे चावल और धान शामिल हैं।
निर्धारित नियमों का उल्लंघन करने या पोर्टल पर पंजीकरण नहीं कराने वाली इकाइयों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 6 और 7 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
पांच दक्षिणी राज्यों को स्टॉक लिमिट लगाने की अनुमति
चावल की उपलब्धता और कीमतों पर नियंत्रण के लिए केंद्र ने पांच दक्षिणी राज्यों को भी विशेष अधिकार दिए हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना की सरकारें जरूरत पड़ने पर धान और चावल पर स्टॉक लिमिट लागू कर सकेंगी।
इसके तहत राज्य सरकारें अपने यहां कारोबारियों और अन्य संबंधित संस्थाओं के लिए अधिकतम भंडारण सीमा तय कर सकती हैं। यह व्यवस्था 31 जनवरी 2027 तक प्रभावी रह सकेगी। हालांकि, स्टॉक लिमिट अपने आप लागू नहीं हुई है। संबंधित राज्य सरकारें जरूरत के अनुसार आदेश जारी कर सकती हैं।
कम बुआई और बारिश की कमी से उत्पादन पर चिंता
चावल की कीमतों में तेजी के पीछे इस साल खरीफ सीजन में धान का घटा हुआ रकबा और कमजोर मानसून भी अहम कारक माने जा रहे हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, खरीफ 2026-27 में धान की बुआई का क्षेत्र घटकर करीब 426.8 लाख हेक्टेयर रह गया, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 4 फीसदी कम है।
कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में धान के रकबे में कमी दर्ज की गई है। उद्योग और कारोबार जगत के अनुमानों के मुताबिक, कम रकबे और मौसम की अनिश्चितता का असर इस साल के उत्पादन पर पड़ सकता है।
हालांकि, देश में सरकारी चावल भंडार की स्थिति भी बाजार आपूर्ति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसे में आने वाले महीनों में नई फसल की आवक, सरकारी बिक्री और राज्यों की स्टॉक नियंत्रण व्यवस्था से चावल की कीमतों की दिशा तय होगी।
सरकार के सामने चुनौती केवल बाजार में चावल की उपलब्धता बढ़ाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि सस्ती दरों पर उपलब्ध कराया जाने वाला अनाज वास्तव में उपभोक्ताओं तक पहुंचे। अब देखना होगा कि 50 लाख टन बिक्री का नया लक्ष्य और सख्त स्टॉक निगरानी खुदरा बाजार में कीमतों को कितना राहत दे पाते हैं।
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