लखनऊ (कृषि भूमि ब्यूरो): उत्तर प्रदेश के मूंगफली और तिल उत्पादक किसानों को बाजार में अपनी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ी पहल की है। केंद्र ने खरीफ 2026 सीजन के लिए राज्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 86,500 मीट्रिक टन मूंगफली और 43,250 मीट्रिक टन तिल की खरीद को मंजूरी दे दी है। मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत होने वाली इस खरीद का कुल न्यूनतम समर्थन मूल्य करीब 1,097 करोड़ रुपये है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 3 नवंबर को लखनऊ में इसकी घोषणा की।
केंद्र सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब किसानों को कई बार बाजार में MSP से कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है। सरकारी खरीद से खासतौर पर उन किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो तिलहन की खेती करते हैं और बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का सामना करते हैं।
1,097 करोड़ रुपये की खरीद को मंजूरी
उत्तर प्रदेश सरकार ने खरीफ 2026 सीजन में मूंगफली और तिल की सरकारी खरीद के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा था। केंद्रीय कृषि मंत्री ने इसे मंजूरी दे दी है।
स्वीकृत प्रस्ताव के अनुसार, राज्य में 43,250 मीट्रिक टन तिल की खरीद की जाएगी। इसके लिए निर्धारित MSP का कुल मूल्य करीब 447 करोड़ रुपये है। वहीं, 86,500 मीट्रिक टन मूंगफली की खरीद को मंजूरी मिली है, जिसका MSP मूल्य करीब 650 करोड़ रुपये है।
इस तरह दोनों फसलों की कुल 1,29,750 मीट्रिक टन उपज की सरकारी खरीद का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि, वास्तविक खरीद किसानों के पंजीकरण, उपज की निर्धारित गुणवत्ता और योजना के दूसरे नियमों के अनुसार होगी।
बाजार भाव गिरने पर किसानों को मिलेगा सहारा
मूंगफली और तिल की खरीद मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत की जाएगी। यह योजना केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) का हिस्सा है। इसका उद्देश्य बाजार में कीमतें MSP से नीचे जाने पर किसानों को कम दाम पर उपज बेचने की मजबूरी से बचाना है।
इस व्यवस्था में निर्धारित प्रक्रिया के तहत सरकारी एजेंसियां किसानों से उनकी उपज की खरीद करती हैं। इसके लिए किसानों को संबंधित खरीद व्यवस्था में पंजीकरण कराना होता है। उपज निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश में इस फैसले से तिलहन उत्पादकों को अपनी उपज के लिए बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद है। खासकर उन इलाकों में इसका महत्व बढ़ जाता है, जहां मूंगफली और तिल किसानों के लिए नकदी फसल का विकल्प हैं।
खेत बचाओ अभियान में किसानों से संवाद
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान लखनऊ स्थित ICAR-भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान में ‘खेत बचाओ अभियान’ के कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे। इस दौरान किसान चौपाल का आयोजन भी किया गया, जिसमें उन्होंने किसानों से सीधे संवाद किया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही और कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
शिवराज सिंह चौहान ने किसानों को मिट्टी की सेहत बचाने और रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों के संतुलित इस्तेमाल की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इनके असंतुलित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है। कई इलाकों में भूजल स्तर भी तेजी से गिर रहा है।
उन्होंने किसानों से खेत के कुछ हिस्से में प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील की। उनका कहना था कि खेती में उत्पादन बढ़ाने के साथ मिट्टी और जल संसाधनों का संरक्षण भी जरूरी है।
374 ग्रामीण सड़कों के लिए 544.62 करोड़ रुपये
लखनऊ दौरे के दौरान केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश में ग्रामीण सड़क संपर्क को बेहतर बनाने के लिए भी मंजूरी दी। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत राज्य की 374 सड़कों के निर्माण के लिए 544.62 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किसानों के लिए सड़कें भी उतनी ही जरूरी हैं, क्योंकि इनके माध्यम से वे अपनी उपज को मंडियों और बाजारों तक आसानी से पहुंचा सकते हैं। इस मंजूरी से ग्रामीण क्षेत्रों में आवागमन और कृषि उपज के परिवहन को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ मिट्टी की सेहत पर चिंता
कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि वर्ष 2014 से 2025 के बीच देश में खाद्यान्न उत्पादन में करीब 49 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। भारत अब गेहूं और चावल के उत्पादन में मजबूत स्थिति में है। हालांकि, उन्होंने दालों और तिलहन के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की जरूरत भी बताई।
भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. एसएन सुशील ने देश में गन्ने के रिकॉर्ड उत्पादन का उल्लेख किया। कृषि मंत्रालय के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, 2025-26 में देश का गन्ना उत्पादन करीब 500 मिलियन टन रहने का अनुमान है।
कुल मिलाकर, मूंगफली और तिल की सरकारी खरीद को मिली मंजूरी उत्तर प्रदेश के तिलहन किसानों के लिए महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि खरीद केंद्र कितनी जल्दी खुलते हैं, किसानों का पंजीकरण किस तरह होता है और स्वीकृत मात्रा के मुकाबले वास्तविक खरीद कितनी हो पाती है।
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