बुवाई की यह सुस्ती केवल सरसों तक सीमित नहीं है। गेहूं, दलहन और दूसरी रबी फसलों का रकबा भी पिछले साल की तुलना में काफी पीछे चल रहा है। हालांकि, अभी रबी सीजन की शुरुआत है और आने वाले दिनों में बुवाई की रफ्तार बढ़ने से इन आंकड़ों में बदलाव संभव है।
ऊंचे भाव के बावजूद बुवाई धीमी
सरसों की बुवाई में गिरावट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समय बाजार में इसके भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी ऊपर चल रहे हैं। राजस्थान की विभिन्न मंडियों में हाल के दिनों में सरसों के भाव 7,600 से 9,300 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहे हैं।
केंद्र सरकार ने आगामी रबी फसल की उपज के लिए सरसों का MSP बढ़ाकर 6,613 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। पिछले विपणन सीजन में यह 6,200 रुपये प्रति क्विंटल था। यानी सरकार ने इसमें 413 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। इसके बावजूद बुवाई की रफ्तार में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई दे रही है।
अक्टूबर में देश के कई हिस्सों में बारिश की कमी भी रबी फसलों की शुरुआती बुवाई को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल रही है। हालांकि, हाल की स्थानीय बारिश के बाद सरसों की बुवाई में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
राजस्थान में सबसे ज्यादा गिरावट
देश में सरसों का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य राजस्थान है। लेकिन इस बार यहां भी बुवाई की रफ्तार काफी धीमी है। 30 अक्टूबर तक राज्य में केवल 8.91 लाख हेक्टेयर में सरसों की बुवाई हुई थी, जबकि पिछले साल इसी अवधि तक 22.06 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। इस तरह राजस्थान में रकबा 59.61 फीसदी पीछे है।
दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है। यहां पिछले साल 30 अक्टूबर तक 13.33 लाख हेक्टेयर में रेपसीड और सरसों की बुवाई हुई थी, जबकि इस साल यह क्षेत्रफल घटकर 10.38 लाख हेक्टेयर रह गया है। राज्य में बुवाई पिछले साल की तुलना में करीब 22 फीसदी कम है।
हरियाणा में स्थिति और भी चिंताजनक है। यहां पिछले साल के 2.15 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस बार सिर्फ 60 हजार हेक्टेयर में सरसों की बुवाई हुई है। इस तरह राज्य में रकबा 72.09 फीसदी कम है।
उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और असम में भी सरसों की बुवाई पिछले साल से पीछे है। इन राज्यों में अब तक क्रमशः करीब 4 हजार, 4 हजार और 4 हजार हेक्टेयर में बुवाई हुई है। वहीं पश्चिम बंगाल में स्थिति बेहतर है। यहां पिछले साल के 23 हजार हेक्टेयर के मुकाबले इस बार 37 हजार हेक्टेयर में सरसों की बुवाई हो चुकी है।
तिलहन और दलहन की बुवाई भी पीछे
सरसों रबी सीजन की प्रमुख तिलहन फसल है। देश में पिछले पांच वर्षों का तिलहन फसलों का औसत रकबा 90.76 लाख हेक्टेयर है। इसमें रेपसीड और सरसों का औसत हिस्सा 82.78 लाख हेक्टेयर है। लेकिन इस बार सभी तिलहन फसलों की बुवाई भी काफी धीमी है।
30 अक्टूबर तक देश में कुल 20.97 लाख हेक्टेयर में तिलहन फसलों की बुवाई हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि तक यह आंकड़ा 38.62 लाख हेक्टेयर था। इस तरह तिलहन का कुल रकबा 45.7 फीसदी कम है।
हालांकि, मूंगफली की बुवाई में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले साल 30 अक्टूबर तक 15 हजार हेक्टेयर में मूंगफली की बुवाई हुई थी, जो इस बार बढ़कर 25 हजार हेक्टेयर हो गई है। इसमें 62 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है।
दलहन फसलों की बुवाई भी 51.7 फीसदी पीछे है। पिछले साल के 19.56 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस बार केवल 9.45 लाख हेक्टेयर में दलहन की बुवाई हुई है।
गेहूं की बुवाई में भी सुस्ती
रबी की सबसे प्रमुख खाद्यान्न फसल गेहूं की बुवाई भी अभी शुरुआती स्तर पर है। 30 अक्टूबर तक पिछले साल के 3.34 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस बार केवल 19 हजार हेक्टेयर में गेहूं की बुवाई हुई है। इस तरह शुरुआती रकबा करीब 94 फीसदी कम है।
मोटे अनाज की बुवाई भी पिछले साल के 4.22 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.78 लाख हेक्टेयर रह गई है। इसमें 10.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
कुल मिलाकर 30 अक्टूबर तक देश में सभी रबी फसलों की बुवाई 37.56 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इसी समय तक 69.02 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। यानी कुल रबी रकबा करीब 45.6 फीसदी पीछे है।
आने वाले दिनों में मौसम की अनुकूलता और खेतों में नमी की उपलब्धता यह तय करेगी कि सरसों समेत दूसरी रबी फसलों की बुवाई कितनी तेजी से आगे बढ़ती है। फिलहाल शुरुआती आंकड़े तिलहन, दलहन और गेहूं की खेती के लिए धीमी शुरुआत का संकेत दे रहे हैं।
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